जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने श्रीगंगानगर में सड़क चौड़ीकरण के लिए संपत्तियां तोड़े जाने के मामले में फैसला सुनाते हुए कार्रवाई पर फिलहाल रोक लगा दी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रभावित लोगों की आपत्तियां और दावे सुने बिना सीधे उनकी संपत्तियों और घरों को हटाने या तोड़फोड़ की कार्रवाई नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट ने इसके लिए वरिष्ठ अधिकारियों की एक कमेटी बनाने का आदेश दिया है।
यह कमेटी प्रभावित लोगों की शिकायतें सुनेगी और हर मामले की अलग-अलग जांच करेगी।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने श्रीगंगानगर की संपत्तियों से जुड़े कई मामलों की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।
हाईकोर्ट ने साफ किया कि सड़क चौड़ीकरण का काम जनहित में हो सकता है, लेकिन इसके लिए कानून में तय प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने फिलहाल प्रभावित संपत्तियों को हटाने की कार्रवाई पर रोक लगाते हुए अधिकारियों को दावों और आपत्तियों की जांच के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की कमेटी बनाने का निर्देश दिया है।
हालांकि, कोर्ट ने सड़क चौड़ीकरण की योजना या मास्टर प्लान के मुताबिक सड़क निर्माण को रद्द नहीं किया है। सिर्फ इतना कहा है कि संपत्तियों पर कार्रवाई से पहले प्रभावित लोगों के दावों और आपत्तियों पर फैसला किया जाए।
यानी कमेटी की जांच और सुनवाई पूरी होने के बाद, तय प्रक्रिया का पालन करते हुए सड़क चौड़ीकरण का काम आगे बढ़ाया जा सकता है।
सड़क चौड़ीकरण के लिए कार्रवाई पर विवाद
मामला श्रीगंगानगर में सड़क चौड़ीकरण से जुड़ा है। शहर के 1981-2001 के मास्टर प्लान में संबंधित जमीन पर 80 फीट चौड़ी सार्वजनिक सड़क प्रस्तावित थी।
विवाद तब शुरू हुआ जब श्रीगंगानगर के अर्बन इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट यानी यूआईटी ने सड़क के लिए तय जमीन से कथित कब्जे हटाने की कार्रवाई शुरू की।
यूआईटी का कहना था कि यह जमीन सड़क के लिए तय है और मास्टर प्लान में सड़क के लिए तय जमीन पर कुछ लोगों ने कब्जा कर रखा है।
सिर्फ जमीन खरीदने का एग्रीमेंट होने से किसी व्यक्ति को मालिकाना हक नहीं मिल जाता। इसके बाद संबंधित संपत्तियों को हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई।
वहीं, प्रभावित लोगों ने इसका विरोध करते हुए अपनी संपत्तियों पर वैध हक और कब्जे का दावा किया।
उनका कहना था कि वे लंबे समय से इन संपत्तियों पर रह रहे हैं और उनके पास जमीन से जुड़े दस्तावेज भी हैं।
प्रभावित लोगों ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि उनकी आपत्तियों पर ठीक से विचार किए बिना उन्हें हटाने के नोटिस जारी कर दिए गए।
उन्होंने हाईकोर्ट से कहा कि अगर सड़क के लिए उनकी संपत्तियां जरूरी हैं तो पहले उनकी बात सुनी जाए और कानून के मुताबिक मुआवजा दिया जाए।
संपत्ति बचाने के लिए कोर्ट पहुंचे लोग
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज भंडारी के साथ अधिवक्ता श्रेयांश भंडारी और सलोनी जैन ने कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखा।
उनकी ओर से कहा गया कि प्रभावित लोग दस्तावेजों के आधार पर संबंधित संपत्तियों पर रह रहे हैं। ऐसे में उन्हें बिना पूरी बात सुने वहां से हटाने की कार्रवाई नहीं की जा सकती।
लोगों ने अधिकारियों के सामने अपनी आपत्तियां रखी थीं, फिर भी उन पर उचित तरीके से विचार नहीं किया गया।
उनका आरोप था कि उनकी बात सुने बिना ही उन्हें जमीन से हटाने की कार्रवाई आगे बढ़ा दी गई।
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि अगर सरकार या संबंधित विभाग को सड़क निर्माण के लिए उनकी संपत्ति की जरूरत है, तो कानून के मुताबिक पहले उन्हें सुनवाई का मौका दिया जाना चाहिए और जहां कानून के तहत मुआवजा बनता है, वहां उसका भी पालन होना चाहिए।
हाईकोर्ट ने भी कहा कि किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से हटाने से पहले तय कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
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मास्टर प्लान के साथ प्रक्रिया भी जरूरी
हाईकोर्ट ने माना कि शहर के विकास और सड़क चौड़ीकरण के लिए मास्टर प्लान जरूरी है।
अधिकारियों को मास्टर प्लान के मुताबिक शहर का विकास करने का अधिकार है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि प्रभावित लोगों को बिना सुने उनकी संपत्तियों पर सीधे कार्रवाई की जाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि सड़क चौड़ीकरण का काम बड़े जनहित में हो सकता है, लेकिन इसके लिए कानून में तय प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
इस मामले में कोर्ट ने पाया कि लोगों ने अपनी आपत्तियां अधिकारियों के सामने रखी थीं।
लेकिन उन पर ठीक से विचार किए बिना उन्हें संपत्तियां खाली करने के नोटिस जारी कर दिए गए।
इसी वजह से हाईकोर्ट ने पहले प्रभावित लोगों के दावे और आपत्तियां सुनने की प्रक्रिया पूरी करने को कहा है।
आपत्तियां सुनने के लिए कमेटी बनाने का निर्देश
हाईकोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि 15 दिन के भीतर वरिष्ठ अधिकारियों की कमेटी बनाई जाए।
यह कमेटी उन सभी लोगों की शिकायतों और दावों को देखेगी, जिनकी संपत्तियां सड़क निर्माण या चौड़ीकरण से प्रभावित हो रही हैं।
कमेटी बनने के बाद प्रभावित लोगों को अपनी आपत्तियां और जमीन से जुड़े दस्तावेज देने का मौका मिलेगा।
इसके लिए भी कोर्ट ने 15 दिन का समय दिया है।
इसके बाद कमेटी हर मामले को अलग-अलग देखेगी और यह तय करेगी कि संबंधित व्यक्ति का जमीन पर कोई वैध हक है या नहीं।
मालिकाना हक सही मिला तो देना होगा मुआवजा
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अगर जांच में किसी व्यक्ति का जमीन पर वैध हक पाया जाता है और उसकी संपत्ति सड़क के लिए जरूरी है, तो उसे कानून के मुताबिक मुआवजा दिया जाना चाहिए।
ऐसे मामले में संबंधित व्यक्ति को वैकल्पिक जमीन देने की स्थिति भी देखी जा सकती है।
यानी सिर्फ यह कहकर किसी को संपत्ति से हटाने की कार्रवाई नहीं की जा सकती कि वह जमीन सड़क के लिए तय है।
पहले यह देखना होगा कि उस जमीन पर रहने या उसका इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति का कानूनी हक क्या है।
पेड़ों का भी रखना होगा हिसाब
इसी आदेश में हाईकोर्ट ने सड़क निर्माण और चौड़ीकरण के दौरान पेड़ों को लेकर भी बड़ा निर्देश दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर सड़क के काम में किसी पेड़ या पौधे को हटाना जरूरी हो तो पहले उसकी गिनती और रिकॉर्ड तैयार किया जाए।
इसके बाद हटाए गए हर एक पेड़ या पौधे के बदले 10 छायादार पौधे आसपास की सार्वजनिक जगहों पर लगाए जाएं।
इसकी जानकारी और अनुपालन रिपोर्ट भी कोर्ट के सामने रखनी होगी।
सड़क चौड़ीकरण पर रोक नहीं
इस आदेश का सीधा मतलब यह है कि श्रीगंगानगर में सड़क चौड़ीकरण की योजना पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
यानी हाईकोर्ट ने श्रीगंगानगर में सड़क चौड़ीकरण की योजना पर रोक नहीं लगाई है।
लेकिन प्रभावित संपत्तियों को हटाने से पहले अब अधिकारियों को कोर्ट के निर्देश के मुताबिक पूरी प्रक्रिया से गुजरना होगा।
पहले कमेटी बनेगी, फिर लोगों की आपत्तियां सुनी जाएंगी और उनके दावों की जांच होगी।
इसके बाद ही तय होगा कि किस संपत्ति पर सड़क के लिए कार्रवाई की जा सकती है और किस मामले में मुआवजा या दूसरी व्यवस्था करनी होगी।
कमेटी की जांच और सुनवाई पूरी होने के बाद अधिकारी मास्टर प्लान के मुताबिक सड़क का काम आगे बढ़ा सकेंगे।
हाईकोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया में प्रभावित लोगों को अपनी बात रखने का मौका देना जरूरी बताया है।