नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान में स्टाम्प ड्यूटी की गणना को लेकर अहम फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संपत्ति की वैल्यू तय करते समय उसका वास्तविक इस्तेमाल देखा जाएगा, सिर्फ मास्टर प्लान में उसका जोन क्या है, यह नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला पलटते हुए राजस्थान टैक्स बोर्ड और अन्य वैधानिक अधिकारियों के पुराने आदेश बहाल कर दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी परिसर में मैन्युफैक्चरिंग का काम हो रहा है और वहीं तैयार सामान की बिक्री भी की जा रही है, तो सिर्फ बिक्री होने के कारण उस संपत्ति को कमर्शियल नहीं माना जा सकता।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें संपत्ति को कमर्शियल मानते हुए स्टांप ड्यूटी की वैल्यूएशन करने की बात कही गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान टैक्स बोर्ड और अन्य वैधानिक अधिकारियों के उस निष्कर्ष को बहाल कर दिया, जिसमें संपत्ति को इंडस्ट्रियल इस्तेमाल वाली माना गया था।
गिफ्ट डीड के बाद संपत्ति की वैल्यूएशन पर विवाद
मामला जयपुर की एक बहुमंजिला इमारत से जुड़ा है। इसमें भूतल के अलावा तीन मंजिलें थीं और परिवार इसी परिसर में अपना कारोबार चला रहा था।
परिवार के सदस्यों के बीच संपत्ति का अलग-अलग मालिकाना हक था। एक भाई ने अपने हिस्से की संपत्ति दूसरे भाई को गिफ्ट डीड के जरिए दे दी।
गिफ्ट डीड के समय संपत्ति की वैल्यूएशन रेजिडेंशियल रेट पर की गई और उसी आधार पर स्टांप ड्यूटी जमा की गई।
यहां अहम बात यह थी कि लागू दरों के अनुसार रेजिडेंशियल जमीन की वैल्यूएशन इंडस्ट्रियल जमीन से ज्यादा, लेकिन कमर्शियल जमीन से कम थी।
बाद में सब-रजिस्ट्रार ने संपत्ति का निरीक्षण किया। उन्होंने पाया कि वहां ‘सोढ़ी कार्पेट्स’ नाम से शोरूम चल रहा है। आसपास भी कई व्यावसायिक गतिविधियां थीं।
इसी आधार पर सब-रजिस्ट्रार ने संपत्ति को व्यावसायिक मानते हुए ज्यादा स्टाम्प ड्यूटी की मांग की।
यहीं से संपत्ति के वास्तविक इस्तेमाल और उसकी जोनल पहचान को लेकर विवाद खड़ा हुआ।
कलेक्टर के निरीक्षण में फैक्ट्री के रूप में मिला परिसर
विवाद बढ़ने के बाद कलेक्टर ने भी संपत्ति का निरीक्षण किया।
उनकी रिपोर्ट में सामने आया कि परिसर में निर्माण का काम चल रहा था और संपत्ति का इस्तेमाल फैक्ट्री के तौर पर हो रहा था।
मामला राजस्थान टैक्स बोर्ड के सामने पहुंचा। बोर्ड ने सब-रजिस्ट्रार और कलेक्टर की दोनों रिपोर्ट देखीं।
राजस्थान सरकार के संबंधित सर्कुलर को ध्यान में रखते हुए टैक्स बोर्ड भी इस नतीजे पर पहुंचा कि संपत्ति का इस्तेमाल औद्योगिक गतिविधि के लिए हो रहा है।
यानी निचले स्तर के दोनों वैधानिक प्राधिकरणों ने संपत्ति को औद्योगिक माना।
हाईकोर्ट ने क्यों बदल दिया था फैसला?
राज्य सरकार ने टैक्स बोर्ड के फैसले को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
मामले में हाईकोर्ट ने टैक्स बोर्ड के फैसले को पलट दिया।
हाईकोर्ट का कहना था कि किसी संपत्ति को औद्योगिक दर से आंकने के लिए यह देखना जरूरी है कि वह औद्योगिक क्षेत्र में स्थित है या नहीं।
इसके अलावा वहां सिर्फ निर्माण का काम होना चाहिए। अगर उसी जगह तैयार सामान की बिक्री भी हो रही है तो संपत्ति को व्यावसायिक इस्तेमाल वाली माना जाएगा।
चूंकि इस मामले में तैयार सामान की बिक्री भी उसी परिसर से हो रही थी, इसलिए हाईकोर्ट ने इसे व्यावसायिक संपत्ति माना था।
हाईकोर्ट के इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। संपत्ति के मालिक ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
बिक्री से फैक्ट्री नहीं बनेगी व्यावसायिक
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया कि परिसर में तैयार सामान की बिक्री होने के कारण संपत्ति कमर्शियल हो गई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कलेक्टर ने मौके पर जाकर संपत्ति का निरीक्षण किया था। निरीक्षण में वहां फैक्ट्री में निर्माण का काम होता मिला था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फैक्ट्री में सामान तैयार होने के बाद उसे बेचा भी जाएगा।
अगर तैयार सामान उसी परिसर में बेचा जा रहा है, तो सिर्फ इस वजह से संपत्ति का इस्तेमाल व्यावसायिक नहीं माना जा सकता।
यहां तक कि खुदरा बिक्री होने पर भी संपत्ति का इस्तेमाल औद्योगिक ही माना जाएगा।
यानी किसी फैक्ट्री में अपने बनाए सामान की बिक्री होना अपने आप में उसे व्यावसायिक संपत्ति नहीं बना देता।
यानी कोर्ट ने कागजों पर दर्ज जोनल कैटेगरी के बजाय जमीन पर वास्तव में हो रहे काम को ज्यादा महत्व दिया।
स्टाम्प ड्यूटी में जोन नहीं, इस्तेमाल अहम
सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार के साल 2004 के सर्कुलर का भी हवाला दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि औद्योगिक संपत्ति की वैल्यू तय करने वाले इस सर्कुलर में मुख्य जोर संपत्ति के इस्तेमाल पर है, सिर्फ उसके क्षेत्र के वर्गीकरण पर नहीं।
अगर दस्तावेज तैयार होने के समय जमीन का इस्तेमाल औद्योगिक गतिविधि के लिए हो रहा है, या वह RIICO औद्योगिक क्षेत्र में है, या उसे औद्योगिक इस्तेमाल के लिए परिवर्तित किया गया है, तो औद्योगिक दर से उसका मूल्यांकन किया जा सकता है।
इसलिए सिर्फ मास्टर प्लान में किसी जगह का जोन क्या है, उसके आधार पर संपत्ति को व्यावसायिक नहीं माना जा सकता।
फैक्ट्री के रूप में रजिस्ट्रेशन भी अहम
सुप्रीम कोर्ट के सामने यह भी रखा गया कि संबंधित परिसर फैक्ट्री के रूप में रजिस्टर्ड था और जिला उद्योग केंद्र, जयपुर में भी इसे इंडस्ट्री के तौर पर दर्ज किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्थान सरकार के सर्कुलर को देखते हुए ये तथ्य अहम हैं।
यानी संपत्ति के कागजों में उसका औद्योगिक इस्तेमाल दर्ज होना और मौके पर वास्तव में औद्योगिक गतिविधि चलना, दोनों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि गिफ्ट डीड के समय संपत्ति की वैल्यूएशन रेजिडेंशियल रेट पर की गई थी, जबकि रेजिडेंशियल रेट इंडस्ट्रियल रेट से ज्यादा था।
इसलिए इस मामले में कम स्टांप ड्यूटी देने के लिए संपत्ति को इंडस्ट्रियल बताने का कोई सवाल ही नहीं था। बल्कि जिस रेजिडेंशियल रेट पर स्टांप ड्यूटी दी गई थी, वह इंडस्ट्रियल रेट से अधिक था।
हाईकोर्ट ने सर्कुलर से अलग शर्त लगा दी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्थान हाईकोर्ट ने इंडस्ट्रियल रेट से वैल्यूएशन के लिए ऐसी शर्त तय कर दी, जो राजस्थान सरकार के सर्कुलर में है ही नहीं।
सर्कुलर में यह नहीं कहा गया है कि इंडस्ट्रियल रेट का फायदा तभी मिलेगा, जब परिसर में सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग का काम हो और तैयार सामान की बिक्री न की जाए।
ऐसे में सिर्फ इस आधार पर कि फैक्ट्री में तैयार सामान की रिटेल बिक्री भी हो रही थी, संपत्ति को कमर्शियल मानना सही नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इंडस्ट्रियल जमीन के लिए कम वैल्यूएशन रखने का मकसद उद्योगों को बढ़ावा देना है।
इसलिए स्टाम्प ड्यूटी तय करते समय सर्कुलर में दी गई शर्तों के साथ यह भी देखना होगा कि संपत्ति का वास्तविक इस्तेमाल किस काम के लिए हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और राजस्थान टैक्स बोर्ड व कलेक्टर के आदेश बहाल कर दिए।
इन आदेशों में संपत्ति को इंडस्ट्रियल इस्तेमाल वाली माना गया था।
हालांकि, पहले जमा की गई स्टाम्प ड्यूटी वापस नहीं मिलेगी।
गिफ्ट डीड में संपत्ति का मूल्यांकन रेजिडेंशियल रेट से किया गया था। यह रेट इंडस्ट्रियल रेट से ज्यादा था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गिफ्ट डीड करने वाले ने अपनी जानकारी के साथ स्वेच्छा से रेजिडेंशियल रेट पर वैल्यूएशन कराया था।
इसलिए अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर पहले जमा की गई अतिरिक्त स्टाम्प ड्यूटी वापस मांगने का हक नहीं होगा।
