टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

राजस्थान एडिशनल एडवोकेट जनरल की नियुक्ति पर विवाद खत्म: AAG बने रहेंगे जस्टिस पीके मिश्रा के बेटे पद्मेश, सुप्रीम कोर्ट में चुनौती वाली याचिका खारिज

Supreme Court Questions Downgrade of Judge’s APAR, Seeks Rajasthan HC Record Over ‘Doubtful’ Remark

नई दिल्ली। राजस्थान सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में राज्य के मामलों की पैरवी के लिए नियुक्त किए गए एडिशनल एडवोकेट जनरल पद्मेश मिश्रा की नियुक्ति पर अब कानूनी विवाद खत्म हो गया है।

10 साल की प्रैक्टिस का अनुभव नहीं होने के बावजूद पद्मेश मिश्रा के राजस्थान में एडिशनल एडवोकेट जनरल के पद पर बने रहने का रास्ता साफ हो गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने पद्मेश मिश्रा की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी और राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है।

पद्मेश मिश्रा सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा के बेटे हैं, जिन्हें राजस्थान सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में राज्य के मामलों की पैरवी के लिए AAG नियुक्त किया था।

याचिका में दावा किया गया था कि पद्मेश मिश्रा के पास राजस्थान की 2018 की लिटिगेशन पॉलिसी के मुताबिक AAG के लिए जरूरी 10 साल की प्रैक्टिस का अनुभव नहीं था।

इस आधार पर उनकी नियुक्ति को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अब इस चुनौती को स्वीकार नहीं किया।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने एडवोकेट सुनील समदरिया की ओर से दाखिल SLP खारिज करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया।

यह भी पढ़ें: जस्टिस संजय के. अग्रवाल होंगे राजस्थान के नए मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने की नाम की सिफारिश

23 अगस्त 2024 को हुई थी नियुक्ति

राजस्थान सरकार ने 23 अगस्त 2024 को पद्मेश मिश्रा को सुप्रीम कोर्ट में राज्य के मामलों की पैरवी के लिए AAG नियुक्त किया था।

इसी दिन सरकार ने राजस्थान स्टेट लिटिगेशन पॉलिसी, 2018 में क्लॉज 14.8 भी जोड़ा था।

इस प्रावधान में कहा गया कि पॉलिसी में कुछ भी लिखा हो, संबंधित अथॉरिटी किसी वकील की संबंधित क्षेत्र में विशेषज्ञता को देखते हुए उसे किसी भी पद पर नियुक्त कर सकती है।

यही बदलाव इस पूरे विवाद का अहम हिस्सा बना।

एडवोकेट सुनील समदरिया ने राजस्थान हाईकोर्ट में क्वो वारंटो रिट के जरिए पद्मेश मिश्रा की नियुक्ति को चुनौती दी।

उनका कहना था कि पॉलिसी में AAG के लिए 10 साल की प्रैक्टिस की शर्त है और पद्मेश मिश्रा इस शर्त को पूरा नहीं करते।

उन्होंने नियुक्ति आदेश के साथ-साथ पॉलिसी में जोड़े गए क्लॉज 14.8 को भी चुनौती दी।

यह भी पढ़ें: जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी होंगे जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश,सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने की सिफारिश

हाईकोर्ट ने पहले ही खारिज कर दी थी चुनौती

इस मामले में राजस्थान हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने 4 फरवरी 2025 को ही समदरिया की याचिका खारिज कर दी थी।

हाईकोर्ट ने माना था कि क्लॉज 14.8 के तहत सरकार को संबंधित क्षेत्र में वकील की विशेषज्ञता को देखते हुए नियुक्ति करने का अधिकार है।

हाईकोर्ट को ऐसा कोई ठोस आधार भी नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि सरकार ने मनमाने तरीके से इस अधिकार का इस्तेमाल किया।

इसके बाद समदरिया ने हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में अपील की।

डिवीजन बेंच ने भी 2 दिसंबर 2025 को उनकी अपील खारिज कर दी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

यह भी पढ़ें: देश के कोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर में बदलाव का बड़ा प्लान, नए कॉम्प्लेक्स से डिजिटल सुविधाओं तक का रोडमैप तैयार; कमेटी ने CJI को सौंपी रिपोर्ट

लिटिगेशन पॉलिसी सख्त नियम नहीं

समदरिया की ओर से यह दलील भी दी गई कि पॉलिसी में बदलाव को गजट में प्रकाशित किया गया था। इसलिए उसे कानूनी ताकत मिल गई थी।

हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि राजस्थान स्टेट लिटिगेशन पॉलिसी कोई ऐसा कानून नहीं है, जिसकी हर शर्त AAG की नियुक्ति पर सख्ती से लागू हो।

हाईकोर्ट के मुताबिक यह पॉलिसी मुख्य तौर पर मुकदमों में राज्य के कामकाज के लिए एक गाइडलाइन है। इसे सरकारी वकीलों की नियुक्ति के लिए बाध्यकारी नियम नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि गजट में सिर्फ राजस्थान स्टेट लिटिगेशन पॉलिसी में क्लॉज 14.8 जोड़ने की सूचना प्रकाशित की गई थी। इससे यह नहीं माना जा सकता कि किसी कानून या वैधानिक नियम में बदलाव हुआ है।

AAG का पद कोई संवैधानिक पद नहीं

हाईकोर्ट ने एडवोकेट जनरल और एडिशनल एडवोकेट जनरल के पद के बीच अंतर भी समझाया था।

एडवोकेट जनरल का पद संविधान के आर्टिकल 165 के तहत आता है। यह संवैधानिक पद है।

वहीं राजस्थान में एडिशनल एडवोकेट जनरल और दूसरे सरकारी वकील इस श्रेणी में नहीं आते।

AAG यानि एडिशनल एडवोकेट जनरल, एडवोकेट जनरल की मदद करते हैं और राज्य सरकार उन्हें अलग-अलग विभागों के मामलों की जिम्मेदारी दे सकती है। उनका कार्यकाल भी निश्चित नहीं होता।

इसी वजह से हाईकोर्ट ने कहा था कि किसी AAG की नियुक्ति को सिर्फ लिटिगेशन पॉलिसी में दी गई 10 साल की प्रैक्टिस की शर्त के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।

प्रैक्टिस के साल ही काबिलियत का पैमाना नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी वकील की काबिलियत सिर्फ इस बात से तय नहीं हो सकती कि उसने कितने साल वकालत की है।

हाईकोर्ट के मुताबिक राज्य सरकार अपने मामलों की पैरवी के लिए किस वकील को उपयुक्त मानती है, यह फैसला सरकार कर सकती है।

एडवोकेट जनरल, एडिशनल एडवोकेट जनरल या दूसरे सरकारी वकीलों की नियुक्ति के लिए हर मामले में एक सख्त नियम तय नहीं किया जा सकता।

इसलिए कोर्ट ने यह तय करने से इनकार किया कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपने मामलों की पैरवी के लिए जिस वकील को चुना, वह नियुक्ति के लिए पर्याप्त रूप से योग्य था या नहीं।

पद्मेश मिश्रा की नियुक्ति को मनमाना नहीं माना

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि पद्मेश मिश्रा की नियुक्ति लिटिगेशन पॉलिसी के सामान्य प्रावधान से अलग थी, लेकिन सिर्फ इस आधार पर इसे गैरकानूनी या मनमाना नहीं कहा जा सकता।

हाईकोर्ट ने माना कि राज्य सरकार को क्लॉज 14.8 के तहत संबंधित क्षेत्र में वकील की विशेषज्ञता को देखते हुए नियुक्ति करने की शक्ति हासिल थी।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने समदरिया की अपील खारिज कर दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनौती खारिज की

हाईकोर्ट के इसी फैसले को सुनील समदरिया ने SLP के जरिए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट में अब सुनील समदरिया की ये चुनौती भी खारिज हो गई।

यानी राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रहेगा और पद्मेश मिश्रा की AAG के तौर पर नियुक्ति को चुनौती देने वाली यह कानूनी लड़ाई फिलहाल खत्म हो गई है।

इस फैसले का सीधा मतलब यह है कि केवल राजस्थान स्टेट लिटिगेशन पॉलिसी में 10 साल की प्रैक्टिस का प्रावधान होने के आधार पर पद्मेश मिश्रा की नियुक्ति को रद्द नहीं किया जाएगा।

सबसे अधिक लोकप्रिय