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22 साल पुराने भूमि विवाद में जेडीए की लापरवाही उजागर, अधिवक्ता नहीं भेजने पर हाईकोर्ट की कड़ी फटकार

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जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने 22 साल से लंबित भूमि विवाद मामले में जयपुर विकास प्राधिकरण को कड़ी फटकार लगाई है।

राजस्थान हाईकोर्ट में दायर दर्जनों याचिकाओं में जेडीए की ओर से पैरवी के लिए कोई अधिवक्ता नहीं पहुंच रहे हैं।

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि अधिकांश याचिकाओं में जेडीए की ओर से कोई भी अधिवक्ता उपस्थित नहीं है।

इस पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए जेडीए को दो सप्ताह के भीतर सभी मामलों में वकील नियुक्त करने और लिखित जवाब तैयार करने के आदेश दिए हैं।

जस्टिस अनुरूप सिंघी ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि वर्ष 2003-04 से लंबित रिट याचिकाओं में और अधिक देरी न्याय के हित में नहीं है।

मामला जयपुर के झोटवाड़ा के खसरा नंबर 469/1 की भूमि से जुड़ा है, जिस पर म्यूचुअल हाउसिंग को-ऑपरेटिव सोसाइटी और मोती भवन निर्माण सहकारी समिति द्वारा आवासीय योजनाएं विकसित किए जाने को लेकर विवाद है।

सहकारी समितियों के बीच भूमि के स्वामित्व को लेकर विवाद पहले रजिस्ट्रार, सहकारिता के समक्ष गया था।

समिति रजिस्ट्रार ने 5 अक्टूबर 2002 को मोती भवन निर्माण सहकारी समिति के पक्ष में आदेश पारित किया था, जिसे बाद में सहकारी अपीलीय ट्रिब्यूनल में चुनौती दी गई।

8 मई 2013 को अपीलीय ट्रिब्यूनल ने रजिस्ट्रार का आदेश निरस्त कर दिया।

इस आदेश के खिलाफ मोती भवन निर्माण सहकारी समिति ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने 16 सितंबर 2013 को यथास्थिति (स्टेटस-क्वो) बनाए रखने के आदेश दिए, जो आज भी जारी है।

जेडीए की अनुपस्थिति पर नाराजगी

राजस्थान हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाओं में जेडीए की ओर से पैरवी के लिए कोई अधिवक्ता उपस्थित नहीं हुए।

जिस पर जस्टिस अनुरूप सिंघी ने इसे गंभीरता से लेते हुए कहा कि चूंकि ये याचिकाएं पिछले 22 वर्षों से लंबित हैं, इसलिए अब मामलों की शीघ्र सुनवाई और निस्तारण आवश्यक है। न्यायहित में देरी को और स्वीकार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की सहमति से मामले को 18 फरवरी 2026 को पुनः सूचीबद्ध किया गया है।

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