बीकानेर में 275 और जयपुर में 60 CCTV कैमरे लगाने के निर्देश; जेलों में मोबाइल की औचक तलाशी, प्रहरी भर्ती और बंदियों की मजदूरी सुनिश्चित करने का आदेश, हर जिले में जिला न्यायाधीश की अध्यक्षता में होगी निगरानी समिति
जयपुर। राजस्थान की जेलों में सुरक्षा व्यवस्था और बंदियों की बुनियादी सुविधाओं को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
अजमेर की हाई सिक्योरिटी जेल में विचाराधीन बंदी जगन गुर्जर की हत्या और उसकी सेल का CCTV कैमरा बंद मिलने के मामले को गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार, गृह विभाग, जेल प्रशासन और संबंधित विभागों को जेल सुधारों के लिए समयबद्ध निर्देश जारी किए हैं।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जेल सुधारों का केवल कागजी अनुपालन पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए लगातार निगरानी और पर्याप्त तकनीकी सहायता जरूरी है।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने जेलों की सुरक्षा, बंदियों के अधिकारों, स्वच्छता, महिला बंदियों की सुविधाओं और हिरासत में मौत से संबंधित कई जनहित याचिकाओं का निस्तारण करते हुए यह आदेश दिया हैं.
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को CCTV कैमरे लगाने, खराब कैमरों की मरम्मत करने, मोबाइल फोन की औचक तलाशी सुनिश्चित करने और जेल कर्मचारियों की आवश्यकता का आकलन करने के निर्देश दिए हैं।
इस मामले में अधिवक्ता प्रतीक कासलीवाल, प्रियंका तिवारी, विदूशी सिंह, सुमति बिश्नोई, सोनल सिंह ने न्यायमित्र के रूप में कोर्ट को असिस्ट किया.
मुलाकात की नीति, रिलीफ स्कीम का आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अपने फैसले में बीकानेर जेल में प्रस्तावित 275 और जयपुर जेल में 60 CCTV कैमरों की स्थापना सहित तकनीकी सुधारों के लिए तीन महीने का समय दिया है।
हाईकोर्ट ने निकट संबंधी बंदियों की मुलाकात से संबंधित नीति दो महीने में अंतिम रूप देने का आदेश दिया हैं.
इसके साथ ही राजस्थान कस्टोडियन डेथ रिलीफ स्कीम, 2025 को तीन महीने के भीतर अधिसूचित करना होगा।
अजमेर जेल में बंदी की हत्या ने खोली पोल
गौरतलब हैं कि राजस्थान हाईकोर्ट प्रदेशभर में जेलो की सुविधाओं से जुड़ी कई जनहित याचिकाओं पर लगातार सुनवाई कर रहा हैं.
याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान ही अजमेर की हाई सिक्योरिटी जेल में 29 जून 2026 को विचाराधीन बंदी जगन गुर्जर की मौत से संबंधित राज्य सरकार की स्टेटस रिपोर्ट पेश कि गयी.
हाईकोर्ट ने इस मामले में 2 जुलाई 2026 को घटना पर संज्ञान लेते हुए विस्तृत रिपोर्ट तलब की थी।
राज्य सरकार की रिपोर्ट के अनुसार, जगन गुर्जर को 29 मार्च 2026 को अजमेर जेल में ट्रांसफर किया गया था.
अपने भाई पप्पू से विवाद के बाद 16 मई 2026 को उसे ब्लॉक नंबर 4, वार्ड नंबर 2 की सेल नंबर 5 में शिफ्ट किया गया था।
29 जून को जगन के साथ उसी सेल में विचाराधीन बंदी विष्णु उर्फ बोना भी मौजूद था।
रिपोर्ट के मुताबिक, दोपहर के समय दोनों के बीच हुई घटनाओं के बाद जगन मृत मिला। विष्णु पर तौलिये से गला घोंटकर उसकी हत्या करने का आरोप है।
राज्य की रिपोर्ट में कहा गया कि विष्णु ने पूछताछ के दौरान कथित तौर पर जगन द्वारा उसके आपराधिक अतीत और परिवार को लेकर ताने दिए जाने को घटना का कारण बताया।
रिपोर्ट के अनुसार, उसने आत्महत्या का रूप देने के प्रयास में पंखा बंद करने की बात भी स्वीकार की।
इस मामले में 29 जून 2026 को अजमेर के सिविल लाइंस थाने में एफआईआर संख्या 0176/2026 दर्ज की गई। एफएसएल टीम को बुलाया गया और न्यायिक जांच शुरू की गई।
हालांकि, हत्या की घटना की जांच जारी है।
सबसे बड़ा सवाल: जिस सेल में हुई घटना, उसी का CCTV कैमरा बंद था
राज्य सरकार की स्टेटस रिपोर्ट के मुताबिक, अजमेर जेल में RAJCOMP के माध्यम से कुल 319 CCTV कैमरे लगाए गए थे।
इनमें से लगभग 258 कैमरे चालू थे और 24 घंटे निगरानी की जा रही थी।
लेकिन जगन गुर्जर की सेल नंबर 5 में लगा कैमरा तकनीकी खराबी के कारण काम नहीं कर रहा था।
सर्वर लॉग के अनुसार, कैमरा 24 जून 2026 को सुबह 9:16 बजे ऑफलाइन हो गया था, जबकि घटना 29 जून को हुई।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि आरोपी विष्णु ने कैमरे की एलईडी जलती देखकर उसे चालू समझा और कथित तौर पर 29 जून को सुबह करीब 10 बजे उसके लेंस पर टूथपेस्ट लगा दिया।
राज्य सरकार ने बताया कि जेल अधीक्षक ने वर्ष 2026 की शुरुआत से ही UPS में खराबी और सर्वर बंद होने की समस्याओं को लेकर DOIT, जिला कलेक्टर और RISL को लगभग 20 लिखित पत्र और ईमेल भेजे थे।
18 जून को अंतिम रिमाइंडर भेजा गया था, जबकि घटना के बाद 30 जून और 8 जुलाई को भी संबंधित अधिकारियों को पत्र भेजे गए।
इस घटनाक्रम ने जेलों में CCTV कैमरों की वास्तविक कार्यशीलता, तकनीकी रखरखाव और निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े किए।
बीकानेर में 275 के मुकाबले सिर्फ 16 कैमरे, अजमेर के महिला बंदी गृह में CCTV नहीं
सुनवाई के दौरान न्यायमित्र की ओर से अदालत को जेलों में CCTV व्यवस्था की कमियों से अवगत कराया गया।
29 अक्टूबर 2025 की निरीक्षण रिपोर्टों के आधार पर कई जेलों की स्थिति सामने रखी गई।
बीकानेर केंद्रीय जेल: प्रस्तावित 275 कैमरों के मुकाबले केवल 16 कैमरे लगे होने की जानकारी दी गई।
जयपुर जिला जेल: 60 कैमरों की आवश्यकता के मुकाबले व्यवस्था अपर्याप्त बताई गई।
कोटा केंद्रीय जेल: केवल 15 कैमरे होने की बात सामने आई।
जोधपुर और उदयपुर: कुल 147 कैमरों में से 37 कैमरे काम नहीं कर रहे थे।
महिला बंदी सुधार गृह, अजमेर: निरीक्षण रिपोर्ट के अनुसार, वहां CCTV कैमरे नहीं थे।
न्यायमित्र ने यह भी बताया कि जेलों में बंदियों की बढ़ती संख्या के अनुरूप कर्मचारियों की उपलब्धता का आकलन आवश्यक है।
केवल पहले की भर्ती के आंकड़े पेश करना वर्तमान जरूरतों की पूर्ति साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा…
न्यायमित्र द्वारा दिए गए तथ्यों और सरकार की रिपोर्ट सहित सभी की दलीले सुनने के बाद हाईकोर्ट ने संपूर्ण राज्य की जेलो को सख्त आदेश दिए.
हाईकोर्ट ने राजस्थान के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग (DOIT) के निदेशक और RAJCOMP Info Services Ltd. (RISL) को जेलों की लंबित तकनीकी शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई करने का आदेश दिया है।
अदालत ने तीन महीने के भीतर निम्नलिखित कार्य पूरे करने के आदेश दिए हैं:
- बीकानेर जेल में प्रस्तावित 275 CCTV कैमरे लगाए जाएं।
- जयपुर जेल में प्रस्तावित 60 कैमरों की स्थापना सुनिश्चित की जाए।
- निरीक्षण रिपोर्टों में चिन्हित खराब कैमरों की मरम्मत की जाए।
- CCTV रिकॉर्डिंग के लिए पर्याप्त स्टोरेज और बैकअप सिस्टम कार्यशील बनाए जाएं।
- जेलों से प्राप्त लंबित तकनीकी शिकायतों पर उचित कार्रवाई की जाए।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा हैं कि इन आदेशों का उद्देश्य केवल कैमरों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि जेलों में निगरानी व्यवस्था को वास्तव में कार्यशील और प्रभावी बनाना है।
जेलों में मोबाइल फोन मिले तो दर्ज होगा जेल-वार रिकॉर्ड
हाईकोर्ट ने जेलों में मोबाइल फोन की मौजूदगी और उनसे संभावित आपराधिक गतिविधियों को रोकने के लिए भी सख्त आदेश दिए हैं।
जेल विभाग को नियमित, गहन और औचक तलाशी के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करनी होगी।
तलाशी के दौरान बरामद मोबाइल फोन का जेल-वार रिकॉर्ड भी रखना होगा।
इसका मतलब है कि केवल जैमर लगाने या तलाशी अभियान चलाने की जानकारी पर्याप्त नहीं होगी।
संबंधित विभागों को तलाशी और बरामदगी का व्यवस्थित रिकॉर्ड रखना होगा, जिससे सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता की जांच की जा सके।
तीन महीने में जेल प्रहरियों की जरूरत का आकलन और भर्ती
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह वर्तमान बंदी संख्या के आधार पर चालानी गार्डों की वास्तविक आवश्यकता का आकलन करे और तीन महीने के भीतर समयबद्ध भर्ती प्रक्रिया शुरू करे।
अदालत ने बंदियों को दिए जाने वाले पारिश्रमिक को भी सुप्रीम कोर्ट के Phool Kumari v. Superintendent, Central Jail, Tihar, New Delhi मामले में निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है।
महिला जेलों में सैनिटरी नैपकिन मशीनें, दो महीने में बनेगी मुलाकात की नीति
महिला बंदियों की बुनियादी सुविधाओं पर भी हाईकोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिए हैं।
राज्य सरकार को सभी महिला जेलों में सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीनों की कार्यशील उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी।
इसके अलावा, पति-पत्नी या माता-पिता और बच्चों जैसे निकट संबंधियों में से जेल में बंद व्यक्तियों को समय-समय पर मुलाकात की अनुमति देने से संबंधित नीति को दो महीने के भीतर अंतिम रूप देना होगा।
इस तरह अदालत ने जेलों में सुरक्षा के साथ-साथ स्वच्छता, गरिमा और पारिवारिक संबंधों से जुड़े विषयों को भी अपने निर्देशों में शामिल किया है।
हिरासत में मौत पर राहत योजना को तीन महीने में अधिसूचित करना होगा
राज्य सरकार ने अदालत को Rajasthan Custodian Death Relief Scheme, 2025 के संबंध में जानकारी दी थी। यह योजना हिरासत में मौत के मामलों में राहत देने से संबंधित है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को योजना को अंतिम रूप देने, अनुमोदित करने और औपचारिक रूप से अधिसूचित करने के लिए फैसले की तारीख से तीन महीने का समय दिया है।
हर जिले में जिला न्यायाधीश की अध्यक्षता में निगरानी समिति
हाईकोर्ट ने जेलों से संबंधित मामलों का निस्तारण करते हुए राज्य स्तरीय निगरानी समिति गठित करने का आदेश दिया है।
संबंधित जिले के जिला न्यायाधीश समिति के अध्यक्ष होंगे।
समिति में राजस्थान के जेल महानिदेशक, राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (RSLSA) के सदस्य सचिव और DOIT के निदेशक शामिल होंगे।
समिति को हर तीन महीने में बैठक कर हाईकोर्ट के नए आदेशों और 27 जनवरी 2016 के पूर्व आदेश के अनुपालन की समीक्षा करनी होगी।
फैसले की प्रति सभी संबंधित जिला न्यायाधीशों को भेजने के आदेश भी दिए गए हैं।
2008 से चल रही जनहित याचिकाओं का निस्तारण, लेकिन निगरानी जारी रहेगी
राजस्थान हाईकोर्ट में दायर जेलों की स्थिति से जुड़ी इन जनहित याचिकाओं में सुरक्षा, स्वच्छता, पेयजल, महिला बंदियों की सुविधाएं, बंदियों की मजदूरी, हिरासत में मौत और खुली सुधारात्मक संस्थाओं जैसे मुद्दे शामिल थे।
हाईकोर्ट ने माना कि वर्ष 2008 से चली आ रही न्यायिक प्रक्रिया के दौरान कई संस्थागत सुधार हुए हैं, जेल नियमों को अद्यतन किया गया है और बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ है।
हालांकि, अजमेर जेल की घटना यह बताती है कि आदेशों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए निरंतर सतर्कता और पर्याप्त तकनीकी सहायता जरूरी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब राज्य सरकार सुधारों की दिशा में काम कर रही है और संबंधित हत्या की जांच जारी है, तब याचिकाओं को अनिश्चितकाल तक लंबित रखना उपयोगी नहीं होगा।
लेकिन उनका निस्तारण एक मजबूत और सतत निगरानी व्यवस्था के साथ होना चाहिए।
इन्होने की पैरवी
राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद शर्मा, अतिरिक्त महाधिवक्ता जी एस गिल, शितांशु शर्मा, एस पी सिंह राजावत, शिखा शर्मा ने पक्ष रखा.
मामले में अन्य पक्ष के लिए अधिवक्ता शैलेश प्रकाश शर्मा, अंशुमान सक्सेना, मनिषा अग्रवाल, शिल्पा चौधरी और ज्योति राठौड़ ने पक्ष रखा
