एकलपीठ के फैसले को खंडपीठ ने किया खारिज, 23 मई 2022 के संशोधित नियम भर्ती के बीच में लागू नहीं होंगे; पिछली याचिका छिपाने, देरी और चयन प्रक्रिया में शामिल होने पर भी अदालत की अहम टिप्पणियां।
जयपुर। असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती-2021 को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार और राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) को बड़ी राहत दी हैं.
राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और राजस्थान लोक सेवा आयोग की अपीलें स्वीकार कर एकलपीठ के 10 जनवरी 2025 के फैसले को निरस्त कर दिया हैं.
इस फैसले का सीधा असर यह है कि असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती-2021 को 23 मई 2022 के संशोधित नियमों के आधार पर चलाने और साक्षात्कार का वेटेज अधिकतम 10 प्रतिशत रखते हुए संशोधित चयन प्रक्रिया अपनाने संबंधी एकलपीठ के आदेश अब प्रभावी नहीं रहेंगे।
जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद नियमों में किया गया ऐसा संशोधन, जिसे पूर्वव्यापी प्रभाव नहीं दिया गया हो, पहले से चल रही भर्ती पर लागू नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की ओर से पूर्व में दायर एक अन्य याचिका का खुलासा नहीं करने, चयन प्रक्रिया में बिना आपत्ति भाग लेने और लगभग ढाई वर्ष की देरी से चुनौती देने के बिंदुओं को भी फैसले में शामिल किया हैं.
हाईकोर्ट ने फैसले में स्पष्ट कर दिया हैं कि भर्ती विज्ञापन जारी होने के बाद चयन के नियमों में किए गए बदलाव स्वतः पहले से चल रही भर्ती पर लागू नहीं होते।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत से राहत मांगने वाले अभ्यर्थी को सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा करना, समय पर चुनौती देना और चयन प्रक्रिया में भाग लेने के बाद उसके मानदंडों को चुनौती देने से जुड़े कानूनी परिणामों का सामना करना पड़ सकता है।
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही अभ्यर्थी डॉ. रचिता माथुर की रिट याचिका भी खारिज कर दी हैं.
गौरतलब हैं कि एकलपीठ ने भर्ती प्रक्रिया को 23 मई 2022 की अधिसूचना और राजस्थान मेडिकल सर्विस (कॉलेजिएट ब्रांच) रूल्स, 1962 के संशोधित नियम-19 के अनुसार पूरा करने के आदेश दिए थे।
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता विज्ञान शाह ने पैरवी की जिन्हे एडवोकेट संकल्प विजय ने असिस्ट किया.
वही आरपीएससी की ओर से अधिवक्ता युवराज सामंत, नेहा अमोला और तिलक वैध ने पैरवी की.
337 पदों के लिए निकली थी भर्ती, विवाद साक्षात्कार के अंकों को लेकर
राजस्थान लोक सेवा आयोग ने 27 नवंबर 2021 को चिकित्सा शिक्षा विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर के 337 पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था।
ये पद 43 विषयों में ब्रॉड स्पेशियलिटी और सुपर स्पेशियलिटी के लिए थे, जिनके लिए आवेदन की अंतिम तिथि 22 दिसंबर 2021 निर्धारित थी।
डॉ. रचिता माथुर ने असिस्टेंट प्रोफेसर (स्किन एंड वीडी) पद के लिए आवेदन किया था। इस विषय में केवल तीन पद विज्ञापित किए गए थे।
भर्ती विज्ञापन के अनुसार चयन साक्षात्कार के माध्यम से होना था। यदि आवेदन अधिक प्राप्त होते, तो आयोग अभ्यर्थियों की संख्या सीमित करने के लिए स्क्रीनिंग टेस्ट आयोजित कर सकता था।
इसी प्रावधान के तहत 6 मई 2022 को स्किन एंड वीडी विषय की स्क्रीनिंग परीक्षा आयोजित की गई और इसकी उत्तर कुंजी 10 जून 2022 को जारी हुई।
विवाद तब गहराया, जब भर्ती प्रक्रिया के दौरान ही चयन में लिखित परीक्षा, शैक्षणिक अंकों और साक्षात्कार के लिए निर्धारित वेटेज को लेकर अलग-अलग निर्णय सामने आए।
23 मई 2022 की अधिसूचना से बदला चयन का ढांचा
आरपीएससी की पूर्ण पीठ ने 10 मई 2022 को निर्णय लिया था कि जिन विषयों में स्क्रीनिंग टेस्ट नहीं हुआ, उनमें शैक्षणिक अंकों को 40 प्रतिशत और साक्षात्कार को 60 प्रतिशत वेटेज दिया जाएगा।
वहीं, जिन विषयों में स्क्रीनिंग टेस्ट हुआ, उनमें स्क्रीनिंग टेस्ट को 40 प्रतिशत, शैक्षणिक अंकों को 20 प्रतिशत और साक्षात्कार को 40 प्रतिशत वेटेज देने का निर्णय किया गया।
इसके बाद राजस्थान सरकार के कार्मिक विभाग ने 23 मई 2022 को राजस्थान विभिन्न सेवा (द्वितीय संशोधन) नियम, 2022 अधिसूचित किए।
इसके माध्यम से संबंधित नियमों में संशोधन करते हुए साक्षात्कार के अंकों का अधिकतम वेटेज कुल चयन अंकों का 10 प्रतिशत निर्धारित किया गया।
राजस्थान मेडिकल सर्विस (कॉलेजिएट ब्रांच) रूल्स, 1962 का नियम-19 भी संशोधित हुआ।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि नई अधिसूचना के अनुसार भर्ती में साक्षात्कार का वेटेज सीमित किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, राज्य सरकार और RPSC का कहना था कि भर्ती 27 नवंबर 2021 के विज्ञापन के आधार पर शुरू हुई थी, इसलिए बाद में लागू हुए नियमों को इस भर्ती पर पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
पहले जोधपुर में भी दायर की गई थी याचिका, खुलासा नहीं करने पर अदालत की सख्त टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि याचिकाकर्ता द्वारा पूर्व में जोधपुर में याचिका दायर की गई थी.
राज्य सरकार के अनुसार, डॉ. रचिता माथुर ने अन्य याचिकाकर्ताओं के साथ 31 मई 2023 को राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर स्थित मुख्य पीठ में सिविल रिट याचिका संख्या 8167/2023 दायर की थी।
उसमें भी इसी भर्ती में साक्षात्कार के अंकों का वेटेज अधिकतम 12.5 प्रतिशत तक सीमित करने की मांग की गई थी।
जोधपुर पीठ ने 10 जुलाई 2023 को उस याचिका को समयपूर्व मानते हुए खारिज कर दिया था।
अदालत ने इस दौरान पूर्व में पारित एक आदेश का भी संदर्भ लिया था, जिसमें 23 मई 2022 की अधिसूचना को भर्ती विज्ञापन के बाद जारी होने के तथ्य पर विचार किया गया था।
इसके बाद डॉ. माथुर ने 2024 में नई याचिका दायर की, लेकिन उसमें पूर्व की याचिका का खुलासा नहीं किया गया।
राज्य सरकार ने अपील की सुनवाई के दौरान अतिरिक्त शपथपत्र प्रस्तुत कर इस तथ्य को रिकॉर्ड पर रखा।
खंडपीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र असाधारण और विवेकाधीन है।
इसका लाभ लेने वाले व्यक्ति का दायित्व है कि वह अदालत के समक्ष सभी महत्वपूर्ण तथ्यों का पूर्ण और निष्पक्ष खुलासा करे।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय करना याचिकाकर्ता का काम नहीं है कि कौन-सा तथ्य महत्वपूर्ण है और कौन-सा नहीं।
सभी प्रासंगिक तथ्य अदालत के सामने रखने चाहिए, ताकि अदालत स्वयं तय कर सके कि उनका मामले पर क्या प्रभाव पड़ता है।
सहकर्मी द्वारा हस्ताक्षर लेने की दलील भी स्वीकार नहीं
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि संभव है कि किसी सहकर्मी ने उनका हस्ताक्षरित वकालतनामा लेकर उनकी जानकारी के बिना जोधपुर में याचिका दायर कर दी हो।
खंडपीठ ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत अतिरिक्त शपथपत्र के जवाब में याचिकाकर्ता ने कोई प्रतिशपथपत्र दाखिल नहीं किया। ऐसे में पूर्व की याचिका दायर होने का तथ्य विवादित नहीं रहा।
हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता चिकित्सा विज्ञान में मास्टर डिग्री प्राप्त उच्च शिक्षित व्यक्ति हैं।
ऐसे में यह समझना कठिन है कि किसी सहकर्मी ने उनकी जानकारी के बिना वकालतनामे पर हस्ताक्षर प्राप्त कर याचिका दायर कर दी होगी।
खंडपीठ के अनुसार, यह स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण तथ्य का खुलासा नहीं करने की कमी को ढकने के लिए बाद में दिया गया तर्क है।
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने पूर्व की याचिका छिपाकर अदालत का रुख साफ हाथों से नहीं किया। केवल इस आधार पर भी उन्हें अनुच्छेद 226 के तहत राहत देने से इनकार किया जा सकता हैं।
हालांकि, खंडपीठ ने कहा कि वो इस मामले में एकलपीठ के फैसले को चुनौती देने वाली अपीलों पर केवल कानूनी मुद्दों के आधार पर भी फैसला दे रही हैं.
भर्ती के बीच में नियम बदलने पर खंडपीठ का स्पष्ट रुख
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न यह था कि क्या 23 मई 2022 को अधिसूचित संशोधित नियम-19 को 27 नवंबर 2021 के भर्ती विज्ञापन के आधार पर शुरू हुई चयन प्रक्रिया पर लागू किया जा सकता है।
खंडपीठ ने कहा कि संशोधित नियमों में उन्हें राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से लागू करने का प्रावधान था।
नियमों को पूर्वव्यापी प्रभाव देने का कोई प्रावधान नहीं किया गया था। इसलिए वे 23 मई 2022 से प्रभावी हुए।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के Assam Public Service Commission और Tej Prakash Pathak सहित संबंधित फैसलों का हवाला देते हुए भर्ती प्रक्रिया के संबंध में स्थापित कानूनी सिद्धांतों को दोहराया।
खंडपीठ ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया विज्ञापन जारी होने से शुरू होती है और रिक्त पदों को भरने तक चलती है।
सामान्यतः चयन के मानदंड वही होते हैं, जो प्रक्रिया शुरू होने की तारीख पर लागू थे।
बीच में किए गए संशोधन पहले से चल रही भर्ती को प्रभावित नहीं कर सकते, जब तक कि नियमों को स्पष्ट रूप से पूर्वव्यापी प्रभाव न दिया गया हो या लागू नियमों के तहत ऐसा बदलाव अनुमत न हो।
हाईकोर्ट ने पाया कि इस भर्ती के विज्ञापन के समय पुराना नियम-19 प्रभावी था। संशोधन भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के लगभग छह महीने बाद आया। इसलिए संशोधित नियम-19 को इस भर्ती पर लागू करना उचित नहीं था।
संशोधित नियम केवल प्रक्रियात्मक नहीं, चयन की पूरी व्यवस्था में बदलाव था
एकलपीठ ने संशोधित नियम-19 को प्रक्रियात्मक प्रकृति का मानते हुए उसे भर्ती पर लागू किया था। खंडपीठ ने इस निष्कर्ष से असहमति जताई।
हाईकोर्ट के अनुसार, पुराने नियम के तहत चयन मुख्य रूप से साक्षात्कार पर आधारित था।
संशोधित नियम ने चयन प्रक्रिया को दो चरणों—लिखित परीक्षा और साक्षात्कार—में बदल दिया। इसके साथ ही साक्षात्कार के अंकों का अधिकतम वेटेज 10 प्रतिशत कर दिया गया।
खंडपीठ ने कहा कि यह बदलाव केवल आवेदन पत्रों की जांच की प्रक्रिया तक सीमित नहीं था, बल्कि चयन की पूरी व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
इसे लागू करने से अभ्यर्थियों के मौलिक या वास्तविक चयन-संबंधी अधिकार प्रभावित होते। इसलिए इस संशोधन को केवल प्रक्रियात्मक संशोधन नहीं कहा जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि RPSC ने 21 जुलाई 2022 को राज्य सरकार से इस विषय पर राय मांगी थी।
राज्य सरकार ने 28 जुलाई 2022 को स्पष्ट किया था कि भर्ती विज्ञापन जारी होने की तारीख पर लागू नियमों के अनुसार ही पूरी की जानी चाहिए।
खंडपीठ के अनुसार, इस भर्ती पर पुराने नियम लागू करने के संबंध में राज्य सरकार का रुख पहले से स्पष्ट था।
क्या 40 प्रतिशत साक्षात्कार वेटेज असंवैधानिक था? खंडपीठ ने क्या कहा
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि साक्षात्कार के लिए 40 प्रतिशत अंक निर्धारित करना अत्यधिक था और यह सुप्रीम कोर्ट के Ajay Hasia तथा Ashok Kumar Yadav के फैसलों में प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था।
यह भी कहा गया कि विज्ञापन में अंकों के इस विभाजन का स्पष्ट हवाला नहीं किया गया था।
दूसरी ओर, राज्य सरकार और आयोग ने कहा कि चयन में विभिन्न घटकों को कितना वेटेज दिया जाना चाहिए, यह निर्धारित करने का अधिकार भर्ती करने वाली संस्था को है।
RPSC ने पूर्व के निर्णयों के आधार पर स्क्रीनिंग टेस्ट, शैक्षणिक अंकों और साक्षात्कार के लिए वेटेज तय किया था।
खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के Lila Dhar v. State of Rajasthan और अन्य फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि लिखित परीक्षा तथा साक्षात्कार के बीच अंकों का अनुपात सभी सेवाओं के लिए एक समान नहीं हो सकता।
यह सेवा की प्रकृति, आवश्यकताओं और चयन के उद्देश्य के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि Ajay Hasia का मामला शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश से संबंधित था।
सार्वजनिक रोजगार में चयन के संदर्भ में उस निर्णय की टिप्पणियों को उसी तरह यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
खंडपीठ ने इस संदर्भ में Lila Dhar के फैसले पर भरोसा किया।
हाईकोर्ट का निष्कर्ष था कि केवल साक्षात्कार के लिए अपेक्षाकृत अधिक अंक निर्धारित किए जाने से चयन प्रक्रिया अपने आप असंवैधानिक नहीं हो जाती।
न्यायिक हस्तक्षेप के लिए लागू कानूनी सिद्धांतों के अनुसार मनमानी या अन्य वैधानिक दोष का आधार होना आवश्यक है।
स्क्रीनिंग टेस्ट में शामिल होने के बाद चयन प्रक्रिया को चुनौती देने पर भी सवाल
राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस तथ्य पर भी विचार किया कि याचिकाकर्ता ने भर्ती विज्ञापन के अनुसार चयन प्रक्रिया में भाग लिया था और स्क्रीनिंग टेस्ट दिया था।
राज्य सरकार और RPSC ने तर्क दिया कि अभ्यर्थी चयन प्रक्रिया से परिचित थीं और उसमें बिना आपत्ति भाग लेने के बाद अब उसके मानदंडों को चुनौती नहीं दे सकतीं।
हाईकोर्ट ने इससे जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ने चयन प्रक्रिया में बिना किसी आपत्ति के हिस्सा लिया था।
ऐसी स्थिति में वह बाद में विज्ञापन में निर्धारित चयन प्रक्रिया को चुनौती देने से प्रतिबंधित थीं।
खंडपीठ ने इस संबंध में एकलपीठ के उस निष्कर्ष को भी स्वीकार नहीं किया, जिसमें माना गया था कि याचिकाकर्ता और समान स्थिति वाले अभ्यर्थियों ने स्क्रीनिंग टेस्ट से पहले ही कथित अवैधताओं को चुनौती दे दी थी।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहले की याचिका संख्या 1777/2022 मुख्य रूप से आरक्षित वर्गों के बैकलॉग पदों को भरने से संबंधित थी, जबकि वर्तमान याचिका में चयन प्रक्रिया और साक्षात्कार के वेटेज को चुनौती दी गई थी।
इसलिए दोनों याचिकाओं के याचिकाकर्ताओं को समान स्थिति में नहीं माना जा सकता।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता ने स्क्रीनिंग टेस्ट की तारीख से पहले वर्तमान चयन प्रक्रिया को चुनौती नहीं दी थी।
ढाई वर्ष की देरी पर भी खंडपीठ की टिप्पणी
राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिका दाखिल करने में हुई देरी को भी महत्वपूर्ण माना।
खंडपीठ के अनुसार, पूर्व की याचिका को अलग रखकर देखने पर भी याचिकाकर्ता ने पहली बार 14 मई 2024 को संबंधित मामले में पक्षकार बनाए जाने के लिए आवेदन किया था।
यह आवेदन मूल भर्ती विज्ञापन के आधार पर आवेदन करने के लगभग ढाई वर्ष बाद और 23 मई 2022 के संशोधित नियमों की अधिसूचना जारी होने के लगभग दो वर्ष बाद किया गया।
इसके बाद उन्हें नई रिट याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता मिली और उन्होंने वर्तमान याचिका दायर की।
हालांकि, याचिका में इतनी लंबी देरी के लिए कोई उचित स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
खंडपीठ ने कहा कि असाधारण न्यायिक राहत चाहने वाले व्यक्ति को यथाशीघ्र अदालत का रुख करना चाहिए।
देरी होने पर उसका उचित कारण बताना आवश्यक है। इस मामले में याचिकाकर्ता ढाई वर्ष की देरी का संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहीं।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि याचिका देरी और लापरवाही यानी delay and laches से भी प्रभावित थी।
एकलपीठ का आदेश निरस्त, राज्य सरकार और RPSC की अपील स्वीकार
सभी पक्षों की दलीलें और बहस सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य सरकार और राजस्थान लोक सेवा आयोग की अपीलें स्वीकार की.
हाईकोर्ट ने 10 जनवरी 2025 के एकलपीठ के फैसले को निरस्त कर दिया और डॉ. रचिता माथुर की रिट याचिका भी खारिज कर दी।
