ACB को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ा झटका, ग्रेटर निगम में भ्रष्टाचार के बहुचर्चित मामले में एफआईआर रद्द, वित्तीय सलाहकार अचलेश्वर मीणा को मिली बड़ी राहत
जयपुर, 18 मार्च 2026। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर बेंच ने जयपुर ग्रेटर निगम में कथित कमीशनखोरी के बहुचर्चित मामले में ACB की कार्यवाही पर सख्त टिप्पणी करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
जस्टिस चंद्र प्रकाश श्रीमाली की एकलपीठ ने कहा कि बिना प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज किए किसी व्यक्ति के घर में प्रवेश, तलाशी और गिरफ्तारी करना कानून और संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
कोर्ट ने इस मामले में प्रक्रियागत खामियों, अवैध फोन टैपिंग और बिना पर्याप्त साक्ष्य के की गई कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए और याचिकाकर्ता को राहत दी।
क्या है पूरा मामला
यह मामला जयपुर ग्रेटर निगम में टेंडर में 2-3 प्रतिशत कमीशन के बहुचर्चित मामले में वित्तीय सलाहकार अचलेश्वर मीणा से जुड़ा है, जो नगर निगम में वित्तीय सलाहकार के पद पर कार्यरत थे।
उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने आरोप लगाया कि वे ठेकेदारों से बिल भुगतान के बदले 2-3 प्रतिशत कमीशन लेते थे।
ACB को एक गुप्त सूचना मिली थी, जिसके आधार पर निगरानी और फोन टैपिंग की गई। आरोप था कि 7 जनवरी 2022 को रिश्वत की राशि का लेन-देन होने वाला है।
इसी सूचना के आधार पर ACB टीम ने याचिकाकर्ता के घर पहुंचकर तलाशी ली और बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता अचलेश्वर मीणा की ओर से अधिवक्ता सुधीर गुप्ता और पार्थ गुप्ता ने दलीलें देते हुए कहा कि ACB द्वारा की गई पूरी कार्रवाई न केवल अवैध है, बल्कि संविधान के मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन भी है।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि बिना FIR के ACB ने पहले घर पर दबिश दी, तलाशी ली और गिरफ्तारी कर ली, जबकि FIR बाद में दर्ज की गई।
अधिवक्ता ने कहा कि आपराधिक कानून के अनुसार FIR के बिना कोई जांच या गिरफ्तारी वैध नहीं हो सकती।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि तलाशी के दौरान याचिकाकर्ता के घर से एक भी रुपया रिश्वत के रूप में बरामद नहीं हुआ, केवल कुछ कागजात जब्त किए गए, जो स्वयं में अपराध सिद्ध नहीं करते।
दलील दी गई कि ACB ने फोन कॉल और कथित बातचीत के आधार पर मामला बनाया, जबकि कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है जो यह साबित करे कि याचिकाकर्ता ने रिश्वत मांगी या ली है।
बचाव में कहा गया कि फोन टैपिंग के लिए सक्षम प्राधिकारी की वैध अनुमति नहीं ली गई और ना ही टेलीग्राफ एक्ट और आईटी एक्ट के नियमों का पालन किया गया। इस कारण कॉल रिकॉर्डिंग और ट्रांसक्रिप्ट को साक्ष्य नहीं माना जा सकता।
याचिकाकर्ता की ओर से बिना वैध अनुमति फोन टैपिंग और निगरानी करना, बिना अनुमति फोटो और निगरानी करना को संविधान के अनुच्छेद 21 (Right to Privacy) का उल्लंघन बताया और कहा कि याचिकाकर्ता की तलाशी बिना वारंट के की गई और स्वतंत्र गवाह मौजूद नहीं थे।
याचिकाकर्ता ने गिरफ्तारी की प्रक्रिया को गलत बताते हुए कहा कि गिरफ्तारी से पहले नोटिस नहीं दिया गया, ना ही गिरफ्तारी के कारण बताए गए और ना ही 24 घंटे के भीतर उचित प्रक्रिया का पालन किया गया।
अधिवक्ता ने कहा कि याचिकाकर्ता लोक सेवक था और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की धारा 17A के तहत जांच से पहले स्वीकृति जरूरी थी, लेकिन ऐसी कोई अनुमति नहीं ली गई।
राज्य सरकार/ACB का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक मंवेंद्र सिंह और देवी सिंह ने ACB की कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि जांच पूरी तरह कानून के दायरे में की गई है।
ACB ने कोर्ट में कहा कि उसे विश्वसनीय सूचना मिली थी कि नगर निगम में कमीशन का खेल चल रहा है और अधिकारी ठेकेदारों से 2-3% कमीशन ले रहे थे।
ACB ने कहा कि याचिकाकर्ता और अन्य आरोपियों के बीच हुई बातचीत में रिश्वत लेन-देन के संकेत मिले, इसी आधार पर निगरानी और जांच की गई।
ACB की ओर से कहा गया कि सह-आरोपी धनकुमार के पास से लगभग 27 लाख रुपये बरामद हुए, यह राशि कथित रूप से रिश्वत से जुड़ी हुई थी।
सरकार ने कहा कि यह मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक संगठित नेटवर्क का था, याचिकाकर्ता इस नेटवर्क का हिस्सा था।
सरकार ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों के आधार पर तलाशी और गिरफ्तारी की गई और जांच के दौरान मिले दस्तावेज और बातचीत पर्याप्त आधार प्रदान करते हैं।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मामले में रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी भी आपराधिक जांच की शुरुआत FIR से होती है। बिना FIR दर्ज किए तलाशी और गिरफ्तारी करना कानून के खिलाफ है।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में पहले गिरफ्तारी की गई और बाद में FIR दर्ज हुई, जो प्रक्रिया का उल्लंघन है।
कोर्ट ने कहा कि फोन टैपिंग केवल विशेष परिस्थितियों में और वैध अनुमति से ही की जा सकती है और इस मामले में अनुमति प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, इसलिए रिकॉर्डिंग अवैध मानी गई। ऐसी रिकॉर्डिंग को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुट्टस्वामी फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति की निजी बातचीत को बिना वैध प्रक्रिया के रिकॉर्ड करना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
तलाशी और जब्ती प्रक्रिया को भी संदिग्ध मानते हुए कोर्ट ने कहा कि तलाशी बिना वारंट के की गई और स्थानीय गवाहों की उपस्थिति नहीं थी।
अंतिम फैसला
सभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने ACB की पूरी कार्रवाई को अवैध और असंवैधानिक माना और एसीबी में दर्ज FIR तथा उससे जुड़ी कार्यवाही को रद्द करने के आदेश दिए।