हाईकोर्ट ने कहा-परिस्थितिजन्य साक्ष्य की पूरी कड़ी जरूरी, केवल शक के आधार पर दोषसिद्धि नहीं
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने हत्या के अहम मामले में महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि केवल संदेह या आंशिक परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई मामला प्रत्यक्षदर्शी गवाहों पर आधारित न होकर परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित होता है, तब अभियोजन पक्ष के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह ऐसे सबूतों की पूर्ण और निर्विवाद श्रृंखला प्रस्तुत करे, जो किसी अन्य संभावना को समाप्त करते हुए केवल आरोपी की ही दोषसिद्धि की ओर संकेत करे।
यह टिप्पणी राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ के जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने बाबूलाल और उसकी पत्नी रुक्मणी की ओर से दायर आपराधिक अपीलों की सुनवाई करते हुए की है।
हाईकोर्ट ने मामले में याचिकाकर्ता आरोपी बाबूलाल की अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया है, वहीं मामले में दूसरी याचिकाकर्ता और बाबूलाल की पत्नी रुक्मणी की दोषसिद्धि रद्द करते हुए उसे दोषमुक्त कर दिया है।
क्रूर हत्या का मामला
यह मामला भीलवाड़ा जिले के करेड़ा थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जिसमें एक बुजुर्ग महिला की हत्या और उसके बाद सबूत मिटाने के आरोप लगाए गए थे।
भीलवाड़ा जिले के बेमाली गांव की रहने वाली वृद्ध महिला लेहरी बाई अकेली रहती थी।
उसके पति की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी और उसकी कोई संतान भी नहीं थी।
आरोप था कि गांव का ही निवासी बाबूलाल, जो उसके घर के पास रहता था, ने पहले विश्वास में लेकर उसके जेवर और संपत्ति से जुड़े कागजात अपने कब्जे में ले लिए।
बताया गया कि बाबूलाल ने यह कहकर उससे जेवर लिए कि वह गिरवी रखी जमीन और घर को छुड़वा देगा।
बाद में आरोप लगा कि इसी संपत्ति को हासिल करने की नीयत से लेहरी बाई की हत्या कर दी गई और शव को छिपा दिया गया।
जब महिला अचानक लापता हो गई तो उसके रिश्तेदारों और गांव वालों ने पुलिस को सूचना दी।
इसके बाद पुलिस ने जांच शुरू की और बाबूलाल व उसकी पत्नी रुक्मणी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 302 (हत्या), 460 (गंभीर अपराध के साथ घर में घुसना), 380 (चोरी) और 201 (सबूत मिटाना) के तहत मामला दर्ज किया गया।
निचली अदालत का फैसला
मामले की सुनवाई भीलवाड़ा की ट्रायल कोर्ट में हुई।
वहां अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर बाबूलाल को हत्या सहित कई धाराओं में दोषी मानते हुए आजीवन कारावास सहित अन्य सजाएं सुनाईं।
वहीं उसकी पत्नी रुक्मणी को हत्या और चोरी के आरोपों से संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया, लेकिन सबूत मिटाने के आरोप में उसे दोषी ठहराया गया।
ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए दोनों आरोपियों ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की।
अपील में क्या तर्क दिए गए
अपील की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकीलों ने दलील दी कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है और अभियोजन पक्ष इस बात को साबित करने में असफल रहा कि सभी परिस्थितियां एक साथ मिलकर केवल आरोपी की ही दोषसिद्धि की ओर इशारा करती हैं।
उन्होंने अदालत को बताया कि इस मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं है।
मृत्यु का स्पष्ट कारण भी पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाया।
जिन दस्तावेजों और गवाहों के आधार पर संपत्ति के विवाद का दावा किया गया, उनमें भी विरोधाभास हैं।
शव की बरामदगी और अन्य साक्ष्यों की प्रक्रिया में भी कई सवाल हैं।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई साक्ष्य श्रृंखला पूरी तरह से मजबूत नहीं है और उसमें कई महत्वपूर्ण कड़ियां कमजोर हैं।
अभियोजन का पक्ष
वहीं सरकारी पक्ष ने अदालत में कहा कि आरोपी के खिलाफ कई महत्वपूर्ण परिस्थितिजन्य साक्ष्य मौजूद हैं।
अभियोजन पक्ष के अनुसार मृतका आखिरी बार आरोपी के संपर्क में देखी गई थी।
आरोपी की सूचना के आधार पर ही शव की बरामदगी हुई।
मृतका के जेवर और संपत्ति से जुड़े दस्तावेज भी आरोपी के कब्जे से मिले।
कई गवाहों ने बताया कि आरोपी ने मृतका से धोखे से कागजात और जेवर लिए थे।
सरकारी वकील ने अदालत से ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज करने की मांग की।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई मामला प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य के बजाय परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित होता है, तब अदालत को अत्यंत सावधानी के साथ साक्ष्यों का परीक्षण करना होता है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले Sharad Birdhichand Sarda बनाम महाराष्ट्र राज्य का हवाला देते हुए कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित मामलों में कुछ सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है।
इन सिद्धांतों के अनुसार:
- जिन परिस्थितियों से आरोपी के दोषी होने का निष्कर्ष निकाला जा रहा है, वे पूरी तरह स्थापित होनी चाहिए।
- वे परिस्थितियां केवल आरोपी के दोषी होने की ही संभावना दर्शाएं।
- उन परिस्थितियों में कोई अन्य संभावित व्याख्या नहीं होनी चाहिए।
- सभी साक्ष्य मिलकर ऐसी पूर्ण श्रृंखला बनाएं जिससे आरोपी के निर्दोष होने की संभावना समाप्त हो जाए।
अदालत ने कहा कि यदि इन सिद्धांतों का पालन नहीं होता है तो केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर अदालत की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के मामलों में अभियोजन पक्ष को हर कड़ी को मजबूत तरीके से स्थापित करना होता है।
यदि उस श्रृंखला की कोई भी कड़ी कमजोर या अधूरी रह जाती है तो संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि “सौ दोषी छूट जाएं तो भी एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए।”
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपी अपीलकर्ता बाबूलाल की अपील को खारिज करते हुए उसके खिलाफ ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले पर मुहर लगाते हुए उसकी आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है।
वहीं दूसरी आरोपी और बाबूलाल की पत्नी रुक्मणी की अपील को मंजूर करते हुए हाईकोर्ट ने सबूत नष्ट करने के आरोप में दी गई सजा को रद्द करते हुए उसे दोषमुक्त कर दिया।