नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने नए आपराधिक कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत पुलिस रिमांड को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अब पुलिस कानून में तय सीमा के भीतर जरूरत पड़ने पर एक ही आरोपी की पुलिस रिमांड अलग-अलग बार भी मांग सकती है।
हालांकि, पुलिस हिरासत की कुल अवधि कानून में तय सीमा से ज्यादा नहीं होगी।
यानि कानून में तय 15 दिन की कुल पुलिस हिरासत अब एक साथ ही लेना जरूरी नहीं होगा। जरूरत पड़ने पर तय कानूनी अवधि के भीतर इसे अलग-अलग चरणों में भी लिया जा सकेगा। हालांकि, कुल पुलिस हिरासत 15 दिन से अधिक नहीं होगी।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि नए कानून का मकसद जांच एजेंसियों को ज्यादा प्रभावी ढंग से जांच करने का अवसर देना है।
अगर जांच के दौरान बाद में कोई नया सुराग, बरामदगी या अहम जानकारी सामने आती है, तो ऐसी स्थिति में भी पुलिस रिमांड ली जा सकेगी।
यह फैसला आंध्र प्रदेश सरकार की अपील पर सुनाया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आरोपी के अधिकारों की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन ऐसी शर्तें नहीं लगाई जा सकतीं जिनसे जांच एजेंसी की प्रभावी जांच प्रभावित हो।
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पुराने कानून और नए कानून में क्या बदला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस रिमांड को लेकर पहले लागू दंड प्रक्रिया संहिता (CRPC), 1973 और अब लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की व्यवस्था अलग है।
● दंड प्रक्रिया संहिता (CRPC), 1973:
CRPC के तहत पुलिस हिरासत की अधिकतम अवधि 15 दिन थी। अगर पुलिस ने शुरुआती 15 दिनों में पूरी 15 दिन की रिमांड नहीं मांगी या कम दिन की रिमांड ली, तो बाद में बची हुई पुलिस हिरासत मिल सकती है या नहीं, इसे लेकर अलग-अलग कोर्ट्स में अलग-अलग व्याख्याएं सामने आती रही हैं।
● भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023:
BNSS की धारा 187 ने इस स्थिति को स्पष्ट कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब कानून में तय कुल अवधि (40 या 60 दिन, जैसा मामला हो) के भीतर जरूरत पड़ने पर 15 दिन की कुल पुलिस हिरासत अलग-अलग चरणों में भी ली जा सकेगी। हालांकि, कुल पुलिस हिरासत 15 दिन से अधिक नहीं होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस बदलाव का उद्देश्य जांच एजेंसियों को प्रभावी जांच का अवसर देना है।
अगर जांच के दौरान बाद में कोई नया सुराग, बरामदगी या अहम जानकारी सामने आती है, तो केवल इस वजह से पुलिस रिमांड से इनकार नहीं किया जा सकता कि शुरुआती 15 दिन बीत चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस बदलाव का मकसद जांच को अधिक प्रभावी बनाना है। अगर जांच के दौरान बाद में कोई नया तथ्य, सुराग या बरामदगी सामने आती है, तो केवल इस वजह से पुलिस रिमांड से इनकार नहीं किया जा सकता कि शुरुआती 15 दिन बीत चुके हैं।
क्या था मामला?
यह मामला आंध्र प्रदेश में कथित हिरासत में मौत के एक मामले से जुड़ा है। जांच कर रही विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने इस मामले में एक पुलिस इंस्पेक्टर को गिरफ्तार किया था और उससे पूछताछ के लिए पुलिस हिरासत मांगी थी।
मजिस्ट्रेट ने आरोपी की 8 दिन की पुलिस हिरासत मंजूर की, लेकिन उसके साथ 15 शर्तें भी लगा दीं।
इनमें पूछताछ केवल जेल परिसर में करने, आरोपी की आवाजाही की लगातार वीडियो रिकॉर्डिंग और सुरक्षा से जुड़े कई निर्देश शामिल थे।
बाद में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने भी इनमें से अधिकांश शर्तों को बरकरार रखा। इन शर्तों के खिलाफ आंध्र प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
सरकार का कहना था कि आरोपी से केवल जेल परिसर में पूछताछ करने, उसकी आवाजाही की लगातार वीडियो रिकॉर्डिंग कराने और अन्य प्रतिबंधों की वजह से एसआईटी प्रभावी तरीके से जांच नहीं कर पा रही है।
साथ ही सरकार ने यह भी दलील दी कि हाईकोर्ट के आदेश से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 187 के तहत पुलिस को मिले रिमांड संबंधी अधिकारों का भी पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।
इसी अपील की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ हाईकोर्ट की कुछ शर्तों में बदलाव किया, बल्कि BNSS की धारा 187 की भी व्याख्या करते हुए स्पष्ट कर दिया कि कानून में तय कुल अवधि के भीतर 15 दिन की पुलिस हिरासत अलग-अलग चरणों में भी ली जा सकती है।
हाईकोर्ट के आदेश में क्या बदला?
आंध्र प्रदेश सरकार का कहना था कि मजिस्ट्रेट और हाईकोर्ट की ओर से लगाई गई कुछ शर्तों की वजह से एसआईटी प्रभावी तरीके से जांच नहीं कर पा रही थी।
सरकार के अनुसार, आरोपी से केवल जेल परिसर में पूछताछ करने, उसकी आवाजाही की लगातार वीडियो रिकॉर्डिंग कराने और अन्य प्रतिबंधों के कारण जांच आगे बढ़ाने में दिक्कत आ रही थी।
सरकार ने यह भी कहा कि इन शर्तों से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत जांच एजेंसी को मिले पुलिस रिमांड संबंधी अधिकारों का पूरा इस्तेमाल भी नहीं हो पा रहा था।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हिरासत में रहने वाले हर आरोपी की सुरक्षा और उसके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा जरूरी है। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि जांच एजेंसी को कानून के मुताबिक प्रभावी और निष्पक्ष तरीके से जांच करने का पूरा अवसर मिले।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी शर्तें नहीं लगाई जा सकतीं, जिनसे जांच प्रभावित हो या जांच एजेंसी को कानून के तहत मिले अधिकारों के इस्तेमाल में अनावश्यक बाधा आए।
इन्हीं वजहों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में संशोधन किया। कोर्ट ने एसआईटी को आरोपी से केवल जेल परिसर में ही नहीं, बल्कि अपने निर्धारित पूछताछ केंद्र या किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर भी पूछताछ करने की अनुमति दे दी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि BNSS के तहत पुलिस रिमांड से जुड़े प्रावधानों का उद्देश्य प्रभावी जांच सुनिश्चित करना है।
इसलिए ऐसी शर्तें नहीं लगाई जा सकतीं, जिनसे जांच एजेंसी कानून के तहत मिले अधिकारों का प्रभावी इस्तेमाल न कर सके।
वीडियो रिकॉर्डिंग और वकील पर टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूछताछ के दौरान ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग की व्यवस्था जारी रहेगी, ताकि आरोपी के अधिकार सुरक्षित रहें और पूछताछ की प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे। इससे जांच एजेंसी पर बेवजह आरोप लगने की संभावना भी कम रहती है।
हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि आरोपी को एक जगह से दूसरी जगह ले जाते समय हर पल की लगातार वीडियो रिकॉर्डिंग जरूरी नहीं है।
यात्रा के दौरान नेटवर्क, बैटरी, स्टोरेज या अन्य तकनीकी कारणों से रिकॉर्डिंग में रुकावट आ सकती है। केवल इसी आधार पर जांच एजेंसी की कार्रवाई पर सवाल नहीं उठाए जा सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी को पूछताछ के दौरान अपने वकील से मिलने का अधिकार रहेगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वकील पूरी पूछताछ के दौरान लगातार मौजूद रहे या जांच की प्रक्रिया में दखल दे।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश सरकार की अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट और मजिस्ट्रेट की ओर से लगाई गई कुछ शर्तों में संशोधन कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी को कानून के मुताबिक प्रभावी तरीके से जांच करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। साथ ही आरोपी के संवैधानिक अधिकारों और उसकी सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा जाना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 ने पुलिस रिमांड को लेकर पहले लागू दंड प्रक्रिया संहिता (CRPC), 1973 की व्यवस्था में बदलाव किया है।
नए कानून के तहत अगर जांच के दौरान बाद में कोई नया सुराग, बरामदगी या अहम जानकारी सामने आती है, तो कानून में तय कुल अवधि के भीतर जरूरत पड़ने पर पुलिस दोबारा रिमांड मांग सकती है। हालांकि, कुल पुलिस हिरासत कानून में तय सीमा से अधिक नहीं होगी।
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को लेकर ये प्रमुख आदेश भी दिए–
- आदेश की तारीख से आरोपी की 7 दिन की पुलिस हिरासत मंजूर की गई।
- एसआईटी आरोपी से अपने निर्धारित पूछताछ केंद्र या किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर पूछताछ कर सकेगी।
- पूछताछ के दौरान ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग जारी रहेगी, लेकिन आरोपी को एक जगह से दूसरी जगह ले जाते समय लगातार वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य नहीं होगी।
- हिरासत के दौरान आरोपी के साथ मारपीट, धमकी, दबाव या थर्ड-डिग्री का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।
- आरोपी को अपने वकील से मिलने का अधिकार रहेगा, लेकिन वकील पूछताछ में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
- आरोपी की सुरक्षा की जिम्मेदारी जांच अधिकारी, एसआईटी के अधिकारियों और संबंधित जेल या पूछताछ केंद्र के प्रभारी की होगी।
- एसआईटी को निष्पक्ष, वैज्ञानिक और कानून के मुताबिक जांच पूरी करने का निर्देश दिया गया।
- कुल पुलिस हिरासत कानून में तय सीमा से अधिक नहीं होगी।
