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EWS आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा- EWS कोटे के लिए तय ₹8 लाख की सीमा पहली नजर में उचित, अंतिम फैसला अभी बाकी

Supreme Court Says ₹8 Lakh EWS Income Limit Appears Justified at First Glance

नई दिल्ली: अगर किसी परिवार की सालाना आय ₹8 लाख से थोड़ी भी ज्यादा हो जाए, तो क्या उसे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) का आरक्षण नहीं मिलना चाहिए?

क्या सिर्फ एक तय आय सीमा किसी परिवार की असली आर्थिक स्थिति बता सकती है? यही सवाल इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के सामने है।

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) को मिलने वाले 10 फीसदी आरक्षण के लिए तय ₹8 लाख सालाना पारिवारिक आय सीमा पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में ईडब्ल्यूएस आरक्षण के लिए तय ₹8 लाख सालाना पारिवारिक आय सीमा उचित दिखाई देती है। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि यह अंतिम फैसला नहीं है।

मामले की सुनवाई अभी जारी है और सभी पक्षों को सुनने के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

यह मामला सिर्फ एक आय सीमा का नहीं है। इसका असर उन लाखों छात्रों और नौकरी के अभ्यर्थियों पर पड़ सकता है, जो हर साल ईडब्ल्यूएस कोटे के तहत मेडिकल, इंजीनियरिंग और दूसरे पेशेवर पाठ्यक्रमों में दाखिले या सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करते हैं।

दरअसल, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ₹8 लाख की आय सीमा और आय की गणना का मौजूदा तरीका कई बार ऐसे लोगों को भी आरक्षण से बाहर कर देता है, जो वास्तव में आर्थिक रूप से कमजोर हैं।

दूसरी ओर केंद्र सरकार का कहना है कि यह सीमा विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर तय की गई है और इसे बनाए रखने के पीछे पर्याप्त आधार है।

जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि फिलहाल यह सीमा मनमानी नहीं लगती।

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सभी लंबित मामलों का पूरा ब्योरा एक साथ पेश करने का निर्देश दिया है, ताकि पूरे विवाद पर एक साथ सुनवाई हो सके।

अब मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त को होगी।

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क्या है पूरा मामला?

यह याचिका ईडब्ल्यूएस के 10 फीसदी आरक्षण को खत्म करने के लिए नहीं दायर की गई है।

याचिकाकर्ताओं ने सिर्फ उन नियमों को चुनौती दी है, जिनके आधार पर यह तय किया जाता है कि कौन व्यक्ति आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में आएगा और कौन नहीं।

विवाद सिर्फ इस बात को लेकर है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की पहचान के लिए केंद्र सरकार ने जो पात्रता के नियम बनाए हैं, वे कितने सही और व्यावहारिक हैं।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सिर्फ ₹8 लाख सालाना पारिवारिक आय को आधार बनाकर किसी परिवार की आर्थिक स्थिति तय नहीं की जा सकती। कई बार किसी परिवार की वास्तविक आर्थिक स्थिति इससे बिल्कुल अलग होती है।

याचिका में कहा गया कि कई बार आय तय सीमा से थोड़ा अधिक होने के बावजूद परिवार आर्थिक रूप से कमजोर होता है, जबकि कुछ मामलों में सिर्फ आय देखकर वास्तविक आर्थिक स्थिति का सही आकलन नहीं हो पाता।

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याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता तन्वी दुबे ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उनकी चुनौती ईडब्ल्यूएस के 10 फीसदी आरक्षण से नहीं, बल्कि लाभार्थियों की पहचान के लिए अपनाए गए पात्रता मानदंडों से है।

उन्होंने दलील दी कि मौजूदा नियम यह तय करने का सही पैमाना नहीं हैं कि कौन वास्तव में आर्थिक रूप से कमजोर है।

सिर्फ सालाना आय को आधार बनाने और उसकी गणना के मौजूदा तरीके से कई जरूरतमंद लोग आरक्षण के दायरे से बाहर हो जाते हैं।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मौजूदा पात्रता मानदंड हर मामले में किसी परिवार की वास्तविक आर्थिक स्थिति का सही आकलन नहीं कर पाते।

उनका कहना है कि इसी वजह से सरकार द्वारा तय किए गए इन मानदंडों और आय की गणना के तरीके की दोबारा समीक्षा की जानी चाहिए।

₹20 हजार की वजह से छूट गया आरक्षण

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सुनवाई के दौरान एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता पवन रेले ने एक उदाहरण देते हुए बताया कि एक अभ्यर्थी की सालाना पारिवारिक आय तय सीमा से सिर्फ ₹20 हजार अधिक थी।

उन्होंने बताया कि एक अभ्यर्थी की सालाना पारिवारिक आय तय सीमा से सिर्फ ₹20 हजार अधिक हो गई। इसकी वजह यह थी कि आय की गणना में स्टैंडर्ड डिडक्शन को भी शामिल कर लिया गया।

इसी कारण उस अभ्यर्थी को ईडब्ल्यूएस आरक्षण का लाभ नहीं मिल सका।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ऐसे मामले बताते हैं कि मौजूदा पात्रता मानदंड हर बार किसी परिवार की वास्तविक आर्थिक स्थिति को नहीं दर्शाते।

इसी वजह से उन्होंने आय की गणना के मौजूदा तरीके और पात्रता के नियमों की दोबारा समीक्षा की मांग की है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा ने कहा कि पहली नजर में ईडब्ल्यूएस के लिए तय ₹8 लाख सालाना पारिवारिक आय सीमा उचित दिखाई देती है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पूछा कि वर्ष 2021 के मेडिकल दाखिलों से जुड़े विवाद पर अब आगे सुनवाई की क्या जरूरत है, जबकि वह शैक्षणिक सत्र काफी पहले समाप्त हो चुका है।

इस पर याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि मामला सिर्फ 2021 के दाखिलों का नहीं है।

उनका तर्क था कि ईडब्ल्यूएस के लिए यही पात्रता मानदंड आज भी लागू हैं और मेडिकल दाखिलों के साथ-साथ सरकारी नौकरियों में भी इनका इस्तेमाल हो रहा है। इसलिए इस कानूनी सवाल पर सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट फैसला जरूरी है।

2021 से शुरू हुआ मामला

यह पूरा विवाद 2021 के शैक्षणिक सत्र से जुड़ा हुआ है, जब केंद्र सरकार ने नीट के ऑल इंडिया कोटा (AIQ) में ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू किया।

इसके बाद कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं जिनमें कहा गया कि आय सीमा मनमानी है और यह वास्तविक आर्थिक स्थिति को नहीं दर्शाती।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि सरकार ने ₹8 लाख की आय सीमा तय तो कर दी, लेकिन इसके पीछे कोई स्पष्ट और ठोस आधार नहीं बताया।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार से पूछा था कि आखिर यह सीमा किस आधार पर तय की गई।

पांडे समिति ने क्या सिफारिश की?

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद केंद्र सरकार ने एक विशेषज्ञ समिति बनाई। इस समिति की अध्यक्षता पूर्व वित्त सचिव अजय भूषण पांडे ने की थी। इसलिए इसे आम तौर पर पांडे समिति कहा जाता है।

इस समिति का उद्देश्य ईडब्ल्यूएस के लिए पात्रता मानदंडों की समीक्षा करना था। समिति ने कई पहलुओं का अध्ययन करने के बाद अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी।

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि ₹8 लाख सालाना आय सीमा फिलहाल बरकरार रखी जानी चाहिए। हालांकि, समिति ने सिर्फ आय को ही आधार नहीं माना।

दिसंबर 2021 में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है।

समिति ने ₹8 लाख की आय सीमा को बरकरार रखने की सिफारिश की, लेकिन इसके साथ कुछ अतिरिक्त शर्तें भी जोड़ीं:

  • 5 एकड़ या उससे अधिक कृषि भूमि रखने वाले व्यक्ति ईडब्ल्यूएस में नहीं आएंगे।
  • बड़ी आवासीय संपत्ति रखने वाले भी इस श्रेणी से बाहर होंगे।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि केवल वास्तविक आर्थिक रूप से कमजोर लोग ही इस श्रेणी का लाभ उठाएं।

2022 के फैसले से अलग है मामला

साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने जनहित अभियान मामले में 103वें संविधान संशोधन को वैध ठहराया था। इसी संशोधन के जरिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया गया।

उस समय सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण संविधान के अनुरूप है। हालांकि, मौजूदा विवाद आरक्षण की संवैधानिक वैधता को लेकर नहीं है।

इस बार याचिकाकर्ताओं ने सिर्फ उन मानदंडों को चुनौती दी है, जिनके आधार पर यह तय किया जाता है कि कौन व्यक्ति या परिवार ईडब्ल्यूएस आरक्षण का लाभ पाने का हकदार होगा।

सभी मामलों का पूरा ब्यौरा मांगा

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग राज्यों की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। ऐसे में राज्य सरकारें स्थानीय जरूरतों के हिसाब से अपने पात्रता मानदंड तय कर सकती हैं।

हालांकि, इस मुद्दे पर कोर्ट ने फिलहाल कोई अंतिम राय नहीं दी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ईडब्ल्यूएस की आय सीमा और पात्रता मानदंड से जुड़े कई मामले अलग-अलग याचिकाओं में लंबित हैं।

इसलिए याचिकाकर्ताओं को सभी संबंधित मामलों की सूची और उनमें उठाए गए मुद्दों का पूरा विवरण पेश करने को कहा गया है।

इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि किन कानूनी मुद्दों पर अभी फैसला होना बाकी है और कौन से सवाल अब सुनवाई के दायरे में नहीं रह गए हैं।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ इतना कहा है कि ₹8 लाख सालाना पारिवारिक आय सीमा पहली नजर में उचित दिखाई देती है। इस पर अंतिम फैसला अभी आना बाकी है।

हालांकि, कोर्ट की टिप्पणी से इतना जरूर संकेत मिला कि फिलहाल उसे ₹8 लाख की आय सीमा मनमानी या अनुचित नहीं लगी। अब इस सीमा को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं को अपनी दलीलों के समर्थन में ठोस आधार रखना होगा।

अब इस मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त को होगी, जहां सुप्रीम कोर्ट इस अहम संवैधानिक विवाद पर आगे सुनवाई करेगा।

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