नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कॉरपोरेट दिवाला मामलों में बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि किसी कंपनी का रिजोल्यूशन प्लान मंजूर होने के बाद उसके खिलाफ पुराने बकाये की वसूली के लिए सिविल केस या आर्बिट्रेशन आगे नहीं चलाया जा सकता।
अगर कोई दावा दिवाला प्रक्रिया के दौरान तय नहीं हुआ या रिजोल्यूशन प्लान का हिस्सा नहीं बना, तो बाद में उसे दोबारा नहीं उठाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिवाला प्रक्रिया पूरी होने और रिजोल्यूशन प्लान को मंजूरी मिलने के बाद उन दावों पर आगे कार्रवाई नहीं होगी, जो उस योजना का हिस्सा नहीं बने।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आईबीसी का मकसद सफल रिजोल्यूशन आवेदक को पुराने और अनिश्चित दावों के बोझ से मुक्त कर कंपनी को नए सिरे से आगे बढ़ाने का मौका देना है।
जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने यह फैसला टाटा स्टील लिमिटेड की अपील पर सुनाया।
कोर्ट ने कहा कि दिवाला कानून का उद्देश्य किसी कंपनी को पुराने और अनिश्चित दावों के बोझ से मुक्त कर नए सिरे से कारोबार शुरू करने का मौका देना है।
अगर रिजोल्यूशन प्लान मंजूर होने के बाद भी पुराने मुकदमे चलते रहे, तो कोई भी निवेशक ऐसी कंपनी को खरीदने का जोखिम नहीं उठाएगा।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने टाटा स्टील की अपील स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि रिजोल्यूशन प्लान मंजूर होने के बाद ऑपरेशनल क्रेडिटर का सिविल मुकदमा आगे नहीं चल सकता।
साथ ही दूसरे ऑपरेशनल क्रेडिटर की लंबित आर्बिट्रेशन कार्यवाही भी समाप्त कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर रिजोल्यूशन प्लान मंजूर होने के बाद भी पुराने दावों पर मुकदमे चलते रहे, तो दिवाला कानून का पूरा उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।
इससे नए निवेशक या सफल रिजोल्यूशन आवेदक को कभी यह भरोसा नहीं रहेगा कि भविष्य में उसके सामने कितने और दावे आ सकते हैं। यही वजह है कि कानून ‘क्लीन स्लेट’ यानी नई शुरुआत का सिद्धांत अपनाता है।
इस फैसले से उन कंपनियों और निवेशकों को कानूनी स्पष्टता मिलेगी, जो दिवाला प्रक्रिया के तहत किसी कंपनी का अधिग्रहण करते हैं।
अब उन्हें यह भरोसा रहेगा कि रिजोल्यूशन प्लान मंजूर होने के बाद पुराने और अनिश्चित दावों का सामना नहीं करना पड़ेगा।
यह फैसला ऑपरेशनल क्रेडिटर्स के लिए भी अहम है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर कोई दावा दिवाला प्रक्रिया के दौरान तय नहीं होता या रिजोल्यूशन प्लान में शामिल नहीं होता, तो बाद में उसी बकाये की वसूली के लिए सिविल मुकदमा या आर्बिट्रेशन आगे नहीं चलाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट तक मामला कैसे पहुंचा?
यह मामला भूषण स्टील लिमिटेड की दिवाला प्रक्रिया से जुड़ा है।
कंपनी के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया शुरू होने से पहले एक ऑपरेशनल क्रेडिटर ने करीब 38.89 लाख रुपये की वसूली के लिए सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया था।
दूसरी ओर, मैसिक प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड ने अपने बकाये की वसूली के लिए छह आर्बिट्रेशन मामले शुरू किए थे। जब कंपनी के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया शुरू हुई, तब ये सभी मामले अलग-अलग मंचों पर लंबित थे।
यानी सुप्रीम कोर्ट के सामने एक मामला सिविल मुकदमे से जुड़ा था, जबकि दूसरा आर्बिट्रेशन से।
दोनों मामलों में कानूनी सवाल एक ही था कि क्या रिजोल्यूशन प्लान मंजूर होने के बाद भी पुराने बकाये की वसूली के लिए ये कार्यवाहियां जारी रह सकती हैं।
दिवाला प्रक्रिया शुरू होने के बाद दोनों ऑपरेशनल क्रेडिटर्स ने अपने दावे रिजोल्यूशन प्रोफेशनल के सामने भी पेश किए।
हालांकि, उनके दावे सिर्फ एक-एक रुपये की प्रतीकात्मक (नोटेशनल) रकम पर दर्ज किए गए, क्योंकि उस समय उनकी वसूली के मामले अलग-अलग कोर्ट और आर्बिट्रेशन में लंबित थे।
बाद में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण ने टाटा स्टील के रिजोल्यूशन प्लान को मंजूरी दे दी।
इसके बाद टाटा स्टील ने कहा कि अब पुराने सिविल मुकदमे और आर्बिट्रेशन आगे नहीं चल सकते। लेकिन ट्रायल कोर्ट और फिर बॉम्बे हाईकोर्ट ने यह दलील स्वीकार नहीं की। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
रिजोल्यूशन प्लान के बाद नहीं चलेंगे पुराने दावे: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिवाला कानून का पूरा ढांचा इस सिद्धांत पर आधारित है कि रिजोल्यूशन प्लान मंजूर होने के बाद कंपनी को नई शुरुआत मिलनी चाहिए।
जो कंपनी उसे खरीदती है, उसे पहले से पता होना चाहिए कि उसे कौन-कौन सी देनदारियां चुकानी हैं।
कोर्ट ने कहा कि अगर रिजोल्यूशन प्लान मंजूर होने के कई साल बाद भी पुराने मुकदमे और आर्बिट्रेशन चलते रहेंगे, तो नए निवेशक के सामने लगातार नए दावे आते रहेंगे।
ऐसी स्थिति में कोई भी निवेशक बीमार कंपनी को खरीदने के लिए आगे नहीं आएगा और दिवाला कानून का उद्देश्य ही प्रभावित होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि रिजोल्यूशन प्लान मंजूर होने के बाद सिर्फ वही दावे मान्य रहेंगे, जो उस योजना में शामिल हैं।
जो दावे योजना का हिस्सा नहीं बने या दिवाला प्रक्रिया के दौरान तय नहीं हुए, उन्हें बाद में आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। यही आईबीसी के ‘क्लीन स्लेट’ यानी नई शुरुआत के सिद्धांत का आधार है।
₹1 के नोटेशनल क्लेम पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या माना?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिवाला प्रक्रिया के दौरान ऑपरेशनल क्रेडिटर्स के दावे सिर्फ एक रुपये की प्रतीकात्मक (नोटेशनल) रकम पर दर्ज किए गए थे।
बाद में तैयार हुई अंतिम सूची में भी यही स्थिति रही। चूंकि किसी ने इस सूची को चुनौती नहीं दी, इसलिए अब उसे ही अंतिम माना जाएगा।
कोर्ट ने यह दलील भी खारिज कर दी कि एक रुपये का नोटेशनल क्लेम केवल मुकदमा जिंदा रखने के लिए रखा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अंतिम सूची से पहले की टिप्पणी हटा दी गई थी। इससे साफ है कि इन दावों को भविष्य के लिए सुरक्षित नहीं रखा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिजोल्यूशन प्लान को पूरा पढ़कर समझना होगा। उसकी किसी एक शर्त के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि पुराने दावों को आगे के लिए बचाकर रखा गया था। योजना में ऐसी कोई साफ व्यवस्था नहीं थी।
‘क्लीन स्लेट’ सिद्धांत पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिवाला कानून का सबसे बड़ा उद्देश्य किसी कंपनी को पुराने बकाये और कानूनी विवादों के बोझ से बाहर निकालकर उसे नए सिरे से कारोबार शुरू करने का मौका देना है।
इसलिए रिजोल्यूशन प्लान मंजूर होने के बाद कंपनी पर ऐसे पुराने दावे नहीं लादे जा सकते, जो उस योजना का हिस्सा नहीं बने थे।
कोर्ट ने कहा कि जो कंपनी रिजोल्यूशन प्लान के तहत किसी दूसरी कंपनी का अधिग्रहण करती है, उसे पहले से यह पता होना चाहिए कि उसे कितना बकाया चुकाना है।
अगर मंजूरी के बाद भी नए-नए दावे सामने आते रहेंगे, तो पूरी दिवाला प्रक्रिया में अनिश्चितता बनी रहेगी और निवेशकों का भरोसा भी कमजोर होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसी वजह से आईबीसी में ‘क्लीन स्लेट’ यानी नई शुरुआत का सिद्धांत अपनाया गया है।
इसका मतलब यह है कि रिजोल्यूशन प्लान लागू होने के बाद कंपनी पुराने और अनिश्चित दावों से मुक्त होकर आगे बढ़ सके।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यही नियम ऑपरेशनल क्रेडिटर्स के लंबित सिविल केस और आर्बिट्रेशन पर भी लागू होगा। अगर उनका दावा रिजोल्यूशन प्लान में तय नहीं हुआ, तो बाद में वे उन मामलों को आगे नहीं बढ़ा सकते।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने टाटा स्टील की अपील स्वीकार कर ली। कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें ऑपरेशनल क्रेडिटर के सिविल मुकदमे को रिजोल्यूशन प्लान मंजूर होने के बाद भी जारी रखने की अनुमति दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का वह आदेश भी रद्द कर दिया, जिसमें टाटा स्टील की आपत्ति खारिज कर दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिजोल्यूशन प्लान लागू होने के बाद पुराने बकाये की वसूली के लिए यह मुकदमा आगे नहीं चल सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य ऑपरेशनल क्रेडिटर की लंबित आर्बिट्रेशन कार्यवाही भी समाप्त कर दी।
कोर्ट ने साफ कहा कि रिजोल्यूशन प्लान मंजूर होने के बाद ऐसे सभी पुराने दावे खत्म माने जाएंगे, जो दिवाला प्रक्रिया के दौरान तय नहीं हुए या योजना का हिस्सा नहीं बने।
हालांकि, फैसला सुनाते समय सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम सुझाव भी दिया।
कोर्ट ने कहा कि मौजूदा कानून में छोटे ऑपरेशनल क्रेडिटर्स, खासकर एमएसएमई और स्थानीय निकायों के हितों की बेहतर सुरक्षा की जरूरत महसूस होती है। इसलिए कानून आयोग और संसद इस मुद्दे पर विचार कर सकते हैं, ताकि भविष्य में उनके लिए ज्यादा संतुलित व्यवस्था बनाई जा सके।