नई दिल्ली: देशभर के वकीलों की पहचान, डिग्री और रिकॉर्ड को एक ही प्लेटफॉर्म पर लाने के प्रस्ताव को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।
वकीलों का एक साझा डिजिटल रिकॉर्ड बनाने और हर वकील को एक यूनिक पहचान संख्या देने के सुझाव पर सुप्रीम कोर्ट ने सकारात्मक रुख दिखाया है।
कोर्ट ने इस प्रस्ताव को “बहुत इनोवेटिव आइडिया” बताते हुए कहा कि इसे तकनीक की मदद से लागू किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए पहले एक ठोस और व्यावहारिक ढांचा तैयार करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देशभर के वकीलों की जानकारी, उनकी डिग्री और एनरोलमेंट का एक साझा डिजिटल रिकॉर्ड बनाने का सुझाव अच्छा है। हालांकि कोर्ट ने फिलहाल कोई आदेश देने के बजाय याचिकाकर्ता से इसका पूरा प्लान और व्यवस्था बताने को कहा है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहन की बेंच ने यह टिप्पणी बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान की। इस याचिका में देशभर के वकीलों के लिए नेशनल डिजिटल रजिस्ट्री बनाने और सोशल मीडिया पर वकीलों के आचरण को लेकर नियम बनाने की मांग की गई है।
क्यों उठी यह मांग ?
बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है।
याचिका में कहा गया है कि देश में इस समय करीब 18 लाख वकील एनरोल हैं, लेकिन आज भी ऐसा कोई एक राष्ट्रीय रिकॉर्ड मौजूद नहीं है, जहां किसी वकील की पहचान, उसकी डिग्री, उसका एनरोलमेंट और उसकी वर्तमान स्थिति को तुरंत जांचा जा सके।
याचिका के अनुसार देशभर में वकीलों का रिकॉर्ड 23 अलग-अलग स्टेट बार काउंसिल्स के पास मौजूद है। सभी जगह अलग-अलग व्यवस्था होने की वजह से किसी वकील की जानकारी की तुरंत पुष्टि करना आसान नहीं है।
याचिका में दावा किया गया है कि इसी व्यवस्था की कमी का फायदा उठाकर बड़ी संख्या में फर्जी वकील भी सिस्टम में बने हुए हैं।
‘बहुत इनोवेटिव आइडिया’, लेकिन पहले फ्रेमवर्क लाओ
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वकीलों के लिए एक नेशनल डिजिटल रजिस्ट्री बनाने का सुझाव रखा गया।
इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि यह एक “बहुत इनोवेटिव आइडिया” है और आज के समय में तकनीक की मदद से ऐसा किया जा सकता है।
हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ एक सुझाव देने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए यह भी बताना होगा कि पूरी व्यवस्था कैसे काम करेगी और उसे लागू करने का तरीका क्या होगा?
कोर्ट ने कहा कि पहले इस व्यवस्था का पूरा खाका तैयार कर उसके सामने रखा जाए। इसके बाद देखा जाएगा कि इस दिशा में क्या किया जा सकता है।
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‘लॉ यूनिवर्सिटी को भी जोड़ना होगा‘
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण पहलू की ओर भी ध्यान दिलाया।
कोर्ट ने कहा कि यदि देशभर के वकीलों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना है, तो इसमें लॉ यूनिवर्सिटी और दूसरे शिक्षण संस्थानों की भी भूमिका जरूरी होगी।
चीफ जस्टिस ने कहा कि किसी भी राष्ट्रीय व्यवस्था को सफल बनाने के लिए यह जरूरी है कि लॉ यूनिवर्सिटी अपने यहां से पढ़कर निकलने वाले छात्रों का रिकॉर्ड साझा करें। तभी किसी व्यक्ति की डिग्री और शैक्षणिक योग्यता की सही पुष्टि हो सकेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस व्यवस्था को सफल बनाने के लिए सिर्फ बार काउंसिल का रिकॉर्ड काफी नहीं होगा।
आखिर क्या है नेशनल डिजिटल रजिस्ट्री का प्रस्ताव?
याचिका में “नेशनल डिजिटल रजिस्ट्री फॉर लीगल प्रोफेशन ऑफ इंडिया” बनाने का सुझाव दिया गया है।
इस व्यवस्था के तहत देश के हर वकील का एक यूनिक नेशनल एडवोकेट आइडेंटिफायर बनाया जाएगा।इसके साथ ही एक ऐसा डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होगा जिसमें वकील का एनरोलमेंट स्टेटस, शैक्षणिक योग्यता, प्रोफेशनल रिकॉर्ड और अनुशासनात्मक कार्रवाई से जुड़ी जानकारी उपलब्ध रहेगी।
प्रस्ताव के अनुसार किसी भी व्यक्ति, कोर्ट या सरकारी संस्था को मोबाइल फोन के जरिए कुछ सेकंड में किसी वकील की जानकारी जांचने की सुविधा मिल सकेगी।
इसके लिए QR कोड आधारित सार्वजनिक प्रोफाइल की भी व्यवस्था करने का सुझाव दिया गया है।
फर्जी वकीलों का भी उठाया गया मुद्दा
याचिका में फर्जी वकीलों की समस्या को भी गंभीर मुद्दा बताया गया है।
बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने कहा कि देश में बड़ी संख्या में ऐसे लोग वकालत कर रहे हैं जिनकी योग्यता और एनरोलमेंट को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
याचिका में बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन की उस टिप्पणी का भी हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया था कि कोर्टों में प्रैक्टिस करने वाले लोगों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की हो सकती है जिनकी पहचान और योग्यता का सत्यापन नहीं हुआ है।
याचिका के मुताबिक एक राष्ट्रीय डिजिटल रिकॉर्ड बनने से ऐसी समस्याओं को काफी हद तक रोका जा सकेगा।
सोशल मीडिया पर वकीलों के व्यवहार को लेकर भी सवाल
याचिका में सिर्फ डिजिटल रजिस्ट्री की मांग ही नहीं की गई है। इसके साथ-साथ सोशल मीडिया पर वकीलों के बढ़ते प्रचार-प्रसार और पेशेवर आचरण से जुड़े मुद्दे भी उठाए गए हैं।
याचिका में दावा किया गया कि कई वकील सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसे वीडियो और पोस्ट डाल रहे हैं, जिनका उद्देश्य खुद का प्रचार करना होता है। कई बार कोर्ट में पेशी, सफलता के दावे, लग्जरी लाइफस्टाइल, महंगे होटल, विदेशी यात्राओं और महंगी जीवनशैली को दिखाकर पेशेवर छवि बनाने की कोशिश की जाती है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इस तरह की गतिविधियां आम लोगों को गुमराह कर सकती हैं और वकालत पेशे की गरिमा पर भी असर डाल सकती हैं।
‘वकील सबसे पहले प्रोफेशनल एथिक्स सीखते हैं’
सोशल मीडिया से जुड़े मुद्दे पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि ज्यादातर वकील अपने पेशे की जिम्मेदारियों को अच्छी तरह समझते हैं। कोर्ट ने कहा कि वकालत की पढ़ाई और पेशे में सबसे पहले प्रोफेशनल एथिक्स सिखाए जाते हैं।
चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि जो लोग सोशल मीडिया पर इस तरह की गतिविधियां करते हैं, संभव है उनमें से कुछ वास्तव में वकील ही न हों या उनका एनरोलमेंट ही सही तरीके से न हुआ हो।
कोर्ट की इस टिप्पणी को याचिका में उठाए गए फर्जी वकीलों के मुद्दे से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
याचिकाकर्ता ने क्या सुझाव दिया?
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कोर्ट से कहा कि वह इस प्रस्ताव का पूरा खाका और इसे लागू करने का तरीका लिखित रूप में पेश करेगा। इसमें यह बताया जाएगा कि नेशनल डिजिटल रजिस्ट्री कैसे बनाई जा सकती है और उसकी निगरानी कौन करेगा।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया, स्टेट बार काउंसिल्स, यूनिवर्सिटीज और केंद्र सरकार को मिलकर इस व्यवस्था को लागू करना चाहिए।
साथ ही एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत सोशल मीडिया और डिजिटल आचरण को लेकर भी अलग नियम बनाए जाने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम रुख
सभी पक्षों की बात सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कोई अंतिम आदेश जारी नहीं किया।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह पहले एक ठोस और व्यावहारिक ढांचा तैयार कर कोर्ट के सामने रखे। इसके बाद कोर्ट इस पर आगे विचार करेगा कि इस दिशा में क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देशभर के वकीलों का एक साझा डिजिटल रिकॉर्ड बनाने का सुझाव अच्छा है, लेकिन पहले यह बताया जाना चाहिए कि यह व्यवस्था कैसे काम करेगी।
कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई को तय की है।
फैसले का असर
यह मामला देश के लाखों वकीलों और न्याय व्यवस्था से जुड़े लोगों के लिए अहम है।
ऐसी व्यवस्था लागू होने पर किसी भी वकील की पहचान और उसकी शैक्षणिक जानकारी की जांच करना आसान हो जाएगा।
आम लोग कुछ ही मिनटों में यह पता कर सकेंगे कि कोई व्यक्ति वास्तव में वकील है या नहीं और उसकी योग्यता क्या है। इसके अलावा फर्जी एनरोलमेंट, गलत जानकारी और पेशेवर रिकॉर्ड से जुड़ी कई समस्याओं पर भी रोक लग सकती है।
साथ ही सोशल मीडिया पर वकीलों की गतिविधियों को लेकर भी स्पष्ट नियम बनाए जा सकते हैं, ताकि यह तय हो सके कि वकील सोशल मीडिया पर क्या कर सकते हैं और क्या नहीं।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केवल इस विचार को सकारात्मक बताते हुए विस्तृत प्रस्ताव मांगा है, लेकिन यह मामला आने वाले समय में देश की कानूनी व्यवस्था और वकालत पेशे में बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकता है।
