नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामलों में क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी (आपराधिक साजिश) को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है।
कोर्ट ने कहा है कि केवल इस आधार पर किसी सरकारी अधिकारी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता कि वह उस समय मौके पर मौजूद था, जब उसके वरिष्ठ अधिकारी पर रिश्वत लेने का आरोप लगा हो।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साजिश का आरोप साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि आरोपियों के बीच पहले से मिलीभगत थी और सभी ने मिलकर गैरकानूनी काम करने की योजना बनाई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संदेह, साथ मौजूद होना या आपसी परिचय अपने आप में साजिश का सबूत नहीं होता।
सरकारी पक्ष को ऐसे ठोस और भरोसेमंद सबूत पेश करने होंगे, जिनसे यह साबित हो कि आरोपियों ने पहले से मिलकर रिश्वत लेने की योजना बनाई थी। अगर ऐसे सबूत नहीं हैं, तो केवल मौजूदगी के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार की अपील खारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग (सेंट्रल एक्साइज) के तीन अधिकारियों को बरी कर दिया गया था।
मामला क्या था: 1995 की CBI ट्रैप कार्रवाई
यह मामला वर्ष 1995 में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की ओर से किए गए एक ट्रैप ऑपरेशन से जुड़ा था।
आरोप था कि केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग के तत्कालीन अधीक्षक आर.के. श्रीवास्तव ने एक फैक्ट्री से जब्त किए गए दस्तावेज वापस करने के बदले 80 हजार रुपये की रिश्वत मांगी थी।
सीबीआई ने आरोप लगाया कि निरीक्षक ए.के. गाबा, आलोक गुप्ता और दुश्यंत कुमार भी इस पूरी साजिश का हिस्सा थे।
जांच एजेंसी का कहना था कि ये अधिकारी रिश्वत की मांग और रकम लेने की प्रक्रिया के दौरान वहां मौजूद थे, इसलिए उन्हें भी साजिश में शामिल माना जाना चाहिए।
सीबीआई ने इस पूरे मामले को एक संगठित साजिश बताते हुए सभी आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया और ट्रायल शुरू हुआ।
ट्रायल कोर्ट ने क्यों सुनाई सजा
ट्रायल कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद सभी आरोपियों को दोषी मानते हुए सजा सुनाई। कोर्ट ने माना कि यह एक संगठित साजिश थी और सभी आरोपी किसी न किसी रूप में इसमें शामिल थे।
ट्रायल कोर्ट ने इस आधार पर चारों अधिकारियों को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत दोषी ठहराया था।
हालांकि, इस निर्णय को बाद में चुनौती दी गई और मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां पूरी तस्वीर बदल गई।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का दोबारा परीक्षण किया और पाया कि प्रॉसिक्यूशन यह साबित नहीं कर सका कि तीनों निरीक्षक रिश्वत की साजिश में शामिल थे। इसके बाद उन्हें बरी कर दिया गया। इस फैसले को उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट का तर्क: “मीटिंग ऑफ माइंड्स” जरूरी
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने पूरे मामले का पूरा विश्लेषण किया और पाया कि प्रॉसिक्यूशन साजिश के सबसे महत्वपूर्ण तत्व “मीटिंग ऑफ माइंड्स” को साबित नहीं कर पाया।
कोर्ट ने कहा:
“साजिश को केवल संदेह या संबंध के आधार पर नहीं माना जा सकता। इसके लिए ठोस और विश्वसनीय सबूत जरूरी हैं, जो यह दिखाएं कि आरोपियों के बीच पहले से सहमति थी।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपराधिक साजिश साबित करने के लिए केवल शक या किसी व्यक्ति का मौके पर मौजूद होना पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि प्रॉसिक्यूशन को यह दिखाना होगा कि आरोपियों ने पहले से मिलकर गैरकानूनी काम करने की योजना बनाई थी और सभी की मंशा एक जैसी थी।
अगर ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है, तो केवल इस आधार पर कि कोई अधिकारी वहां मौजूद था, उसे साजिश का आरोपी नहीं बनाया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि साजिश तभी मानी जाएगी, जब यह साबित हो कि आरोपियों के बीच पहले से आपसी सहमति थी और उसी के तहत काम किया गया। यानी केवल साथ होना और साजिश में शामिल होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
मामले में प्रॉसिक्यूशन की कमी क्या रही?
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि जांच एजेंसी तीनों अधिकारियों के खिलाफ कोई ऐसा ठोस सबूत पेश नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो कि वे पहले से रिश्वत लेने की योजना में शामिल थे।
कोर्ट ने कहा कि प्रॉसिक्यूशन के मुताबिक भी रिश्वत मांगने का सीधा आरोप सिर्फ अधीक्षक आर.के. श्रीवास्तव पर था। कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि तीनों निरीक्षक रिश्वत मांगने में शामिल थे या उन्होंने इसमें कोई सक्रिय भूमिका निभाई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल किसी वरिष्ठ अधिकारी के साथ मौजूद होने से यह नहीं माना जा सकता कि बाकी अधिकारी भी उसकी साजिश का हिस्सा थे। इसी वजह से तीनों अधिकारियों के खिलाफ धारा 120-बी का आरोप साबित नहीं हो सका।
इलेक्ट्रॉनिक सबूत न पेश करने पर कोर्ट की सख्ती
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि प्रॉसिक्यूशन तीनों अधिकारियों के खिलाफ रिश्वत मांगने का आरोप भी साबित नहीं कर सका।
कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता के अनुसार रिश्वत मांगने की बातचीत की टेप रिकॉर्डिंग भी की गई थी, लेकिन जांच एजेंसी ने वह रिकॉर्डिंग कोर्ट के सामने पेश ही नहीं की।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब जांच एजेंसी ने खुद कहा था कि रिश्वत मांगने की बातचीत की रिकॉर्डिंग मौजूद है, तो उसे कोर्ट में पेश न करना उसके मामले को कमजोर करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि रिकॉर्डिंग कोर्ट में पेश नहीं होने से जांच एजेंसी अपना पक्ष मजबूत तरीके से साबित नहीं कर सकी। इसके अलावा रिकॉर्ड में ऐसा कोई खास सबूत भी नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि तीनों अधिकारियों ने रिश्वत मांगने या लेने में कोई सक्रिय भूमिका निभाई थी।
अंतिम फैसला: राज्य की अपील खारिज
इन सभी तथ्यों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला सही था।
कोर्ट ने माना कि प्रॉसिक्यूशन न तो आपराधिक साजिश साबित कर सका और न ही तीनों अधिकारियों के खिलाफ रिश्वत मांगने के आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत पेश कर पाया।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की अपील खारिज कर दी और तीनों अधिकारियों को बरी करने का हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यह फैसला सिर्फ उन तीन अधिकारियों के खिलाफ मौजूद सबूतों के आधार पर दिया गया है। मुख्य आरोपी आर.के. श्रीवास्तव के मामले पर इस आदेश का कोई असर नहीं पड़ेगा।
फैसले का असर
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश से जुड़े मामलों में अहम है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि किसी सरकारी अधिकारी को केवल संदेह, साथ मौजूद होने या वरिष्ठ अधिकारी से संबंध होने के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
यदि जांच एजेंसी साजिश का आरोप लगाती है, तो उसे यह दिखाना होगा कि आरोपियों ने पहले से मिलकर गैरकानूनी काम करने की योजना बनाई थी। इसके लिए ठोस और भरोसेमंद सबूत पेश करना जरूरी होगा।
यह फैसला जांच एजेंसियों के लिए भी अहम संदेश देता है। केवल परिस्थितियों के आधार पर आरोप लगाने के बजाय उन्हें ऐसे सबूत जुटाने होंगे, जो कोर्ट में यह साबित कर सकें कि आरोपियों के बीच पहले से मिलीभगत थी।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले में अहम इलेक्ट्रॉनिक या अन्य अहम सबूत उपलब्ध हों, तो उन्हें कोर्ट के सामने पेश करना जांच एजेंसी की जिम्मेदारी है। ऐसे सबूत छिपाने या पेश नहीं करने का असर पूरे मुकदमे पर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि केवल शक या मौजूदगी के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। आपराधिक साजिश साबित करने के लिए ठोस सबूत, पहले से मिलीभगत और साझा आपराधिक मंशा दिखाना जरूरी होगा।
