नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों में सजा तय करने को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी आरोपी को सजा देते समय सिर्फ यह नहीं देखा जा सकता कि अपराध कितना गंभीर है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सजा तय करते समय आरोपी का पहले का रिकॉर्ड, जेल में उसका व्यवहार, सुधार की संभावना और समाज पर पड़ने वाले असर जैसे कई पहलुओं पर भी विचार करना होगा।
कोर्ट ने कहा कि सजा तय करते समय कोर्ट को अपराध की गंभीरता और आरोपी से जुड़ी परिस्थितियों, दोनों के बीच संतुलन बनाना होता है।
सजा ऐसी होनी चाहिए, जो पीड़ित और समाज के साथ न्याय करे, लेकिन जहां सुधार की वास्तविक संभावना हो, वहां उसे भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही उचित सजा तय की जानी चाहिए।
इन्हीं सिद्धांतों को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के एक गैंगरेप मामले में दोषसिद्धि तो बरकरार रखी, लेकिन आरोपी एहसान की पूरी प्राकृतिक जीवन तक चलने वाली उम्रकैद की सजा घटाकर 20 साल के कठोर कारावास में बदल दी।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि न्याय तभी पूरा होता है, जब सजा न जरूरत से ज्यादा कठोर हो और न इतनी हल्की कि अपराध की गंभीरता ही कम हो जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपराध बेहद गंभीर है, लेकिन इस मामले में सजा तय करते समय आरोपी के पक्ष में मौजूद परिस्थितियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह मामला क्या था ?
यह मामला सितंबर 2016 में दिल्ली में हुई गैंगरेप की घटना से जुड़ा है। रिकॉर्ड के मुताबिक, पीड़िता रात में दिल्ली रेलवे स्टेशन से अपने घर जाने के लिए रिक्शे में बैठी थी। रिक्शा चालक ने उसे घर छोड़ने का भरोसा दिया, लेकिन वह उसे सुनसान जगह ले गया। वहां पहले से मौजूद दूसरे आरोपी के साथ मिलकर उसके साथ गैंगरेप किया गया। इसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया और जांच शुरू हुई।
ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 376-डी के तहत दोषी ठहराते हुए बाकी प्राकृतिक जीवन तक चलने वाली उम्रकैद और जुर्माने की सजा सुनाई।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद आरोपी एहसान सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने शुरुआत में ही साफ कर दिया था कि वह दोषसिद्धि पर नहीं, बल्कि केवल सजा की अवधि पर सुनवाई करेगा।
सजा तय करने पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर आपराधिक मामले में सजा तय करना सिर्फ कानून की तय सीमा के भीतर कोई अवधि चुन लेने का काम नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी यह भी है कि वह मामले की पूरी परिस्थितियों को देखे और ऐसी सजा तय करे, जो अपराध और आरोपी, दोनों के साथ न्याय कर सके।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर किसी मामले में जरूरत से ज्यादा कठोर सजा दी जाती है, तो यह भी न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ हो सकता है। वहीं, जरूरत से कम सजा देने से पीड़ित, समाज और कानून के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है। इसलिए हर मामले में संतुलन बनाए रखना सबसे जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सजा तय करने का आधार केवल अपराध नहीं हो सकता। आरोपी का आचरण, उसके खिलाफ पहले कोई आपराधिक मामला रहा है या नहीं, अपराध किन परिस्थितियों में हुआ और उसके सुधार की संभावना कितनी है, इन सभी बातों पर एक साथ विचार करना होगा। यही संतुलित सजा का सिद्धांत है।
सजा तय करते समय किन बातों पर होगा विचार?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर मामले के तथ्य अलग होते हैं। इसलिए सजा तय करते समय कोर्ट को कई पहलुओं पर एक साथ विचार करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सजा तय करते समय कोर्ट को इन अहम बातों पर भी विचार करना चाहिए–
- अपराध कितना गंभीर है।
- अपराध से पीड़ित और समाज पर कितना असर पड़ा।
- अपराध पहले से योजना बनाकर किया गया था या नहीं।
- आरोपी का पहले कोई आपराधिक रिकॉर्ड है या नहीं।
- अपराध के पीछे क्या मकसद था।
- जेल में आरोपी का व्यवहार कैसा रहा।
- आरोपी के सुधार की संभावना है या नहीं।
- क्या आरोपी ने किसी भरोसे या रिश्ते का गलत फायदा उठाया।
- मामले में पीड़ितों की संख्या कितनी है।
- समाज में कानून के प्रति विश्वास बनाए रखने के लिए कैसी सजा जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह सूची अंतिम नहीं है। हर मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए जरूरत पड़ने पर दूसरे प्रासंगिक तथ्यों को भी ध्यान में रखा जा सकता है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सजा क्यों घटाई?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि दोषसिद्धि और सजा, दोनों अलग-अलग सवाल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि आरोपी के खिलाफ गैंगरेप का आरोप साबित हुआ है और उसकी दोषसिद्धि में किसी तरह की दखल देने की जरूरत नहीं है।
सवाल सिर्फ इतना था कि क्या उसे पूरी प्राकृतिक जिंदगी तक जेल में रखना इस मामले में जरूरी है?
सुप्रीम ने कहा कि सजा तय करते समय आरोपी के पक्ष में मौजूद परिस्थितियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रिकॉर्ड से पता चला कि घटना के समय आरोपी की उम्र करीब 25 साल थी। उसके खिलाफ पहले किसी अन्य अपराध का कोई रिकॉर्ड नहीं था। इसके अलावा करीब दस साल जेल में रहने के दौरान उसका व्यवहार भी अच्छा रहा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि राज्य सरकार ऐसा कोई ठोस रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकी, जिससे यह साबित हो कि आरोपी के सुधार की कोई संभावना नहीं है। इसलिए इस मामले में यह मानने का आधार नहीं बनता कि उसे पूरी प्राकृतिक जिंदगी तक जेल में ही रखा जाए।
हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि यह अपराध बेहद गंभीर है। गैंगरेप केवल पीड़िता के खिलाफ अपराध नहीं, बल्कि पूरे समाज के खिलाफ अपराध है। इसलिए सजा इतनी कठोर जरूर होनी चाहिए कि कानून का सम्मान बना रहे और ऐसे अपराध करने वालों में डर पैदा हो।
इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने उम्रकैद की सजा घटाकर 20 साल के कठोर कारावास में बदल दी।
गैंगरेप के मामलों में कानून क्या कहता है?
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में यह भी याद दिलाया कि वर्ष 2012 के निर्भया कांड के बाद आपराधिक कानून में बड़े बदलाव किए गए थे। इन्हीं संशोधनों के तहत भारतीय दंड संहिता की धारा 376-डी को नया स्वरूप दिया गया और गैंगरेप के लिए अलग तथा अधिक सख्त सजा का प्रावधान किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस धारा के तहत गैंगरेप के लिए कम से कम 20 साल की सजा देना अनिवार्य है। वहीं, अधिकतम सजा आरोपी के पूरे प्राकृतिक जीवन तक चलने वाली उम्रकैद हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले कानून में विशेष परिस्थितियों में कम सजा देने का विकल्प था, लेकिन 2013 के संशोधन के बाद वह व्यवस्था हटा दी गई।
इससे साफ है कि संसद ने गैंगरेप को बेहद गंभीर अपराध मानते हुए न्यूनतम सजा भी काफी कड़ी रखी है। इसलिए दोषसिद्धि होने पर कोर्ट 20 साल से कम सजा नहीं दे सकता।
महिलाओं के खिलाफ अपराध पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले ऐसे अपराध आज भी समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं। सामाजिक और कानूनी स्तर पर कई बदलाव होने के बावजूद ऐसी घटनाएं पूरी तरह नहीं रुकी हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों का भी जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि हाल के वर्षों में भी देश में हर साल बड़ी संख्या में दुष्कर्म के मामले दर्ज हो रहे हैं। यह बताता है कि ऐसे अपराधों को रोकने के लिए कानून का सख्ती से पालन और उचित सजा देना बेहद जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर गंभीर अपराध में एक जैसी सजा नहीं दी जा सकती। हर मामले के तथ्य अलग होते हैं। इसलिए कोर्ट को अपराध की गंभीरता के साथ-साथ आरोपी से जुड़ी परिस्थितियों और सुधार की संभावना को भी देखना होगा। इन्हीं सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर उचित सजा तय की जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी एहसान की दोषसिद्धि को बरकरार रखा और स्पष्ट किया कि गैंगरेप का अपराध पूरी तरह साबित हुआ है। इसलिए दोषसिद्धि में किसी तरह का बदलाव नहीं किया जाएगा।
हालांकि, कोर्ट ने उसकी सजा में बदलाव करते हुए पूरी प्राकृतिक जिंदगी तक चलने वाली उम्रकैद को 20 साल के कठोर कारावास में बदल दिया। साथ ही कहा कि आरोपी को कानून के मुताबिक मिलने वाली रिमिशन (सजा में छूट) का लाभ भी मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में यही सजा अपराध की गंभीरता, पीड़िता के साथ हुए अन्याय, समाज के हित और आरोपी के सुधार की संभावना के बीच उचित संतुलन बनाती है। इसी आधार पर कोर्ट ने अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए सजा में संशोधन कर दिया।