नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वसीयत और उससे जुड़े प्रोबेट को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि वसीयत के प्रॉबेट के लिए आवेदन करने पर सख्त समय सीमा (लिमिटेशन) लागू नहीं होती।
सुप्रीम कोर्ट ने किया है कि हर मामले में वसीयत बनाने वाले व्यक्ति की मौत के तीन साल के भीतर प्रोबेट के लिए आवेदन करना जरूरी नहीं है। अगर प्रोबेट की जरूरत बाद में पैदा होती है, तो कई साल बाद भी आवेदन किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रोबेट का अधिकार एक निरंतर (कंटीन्यूइंग) अधिकार है।
इसलिए तीन साल की समय सीमा हमेशा वसीयत बनाने वाले व्यक्ति की मौत से नहीं गिनी जाएगी। यह समय उस दिन से शुरू होगा, जब पहली बार प्रोबेट लेना वास्तव में जरूरी हो जाए।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए झारखंड हाईकोर्ट और देवघर की जिला कोर्ट के आदेश रद्द कर दिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों कोर्ट्स ने सिर्फ देरी के आधार पर प्रोबेट की अर्जी खारिज करके कानून की गलत व्याख्या की। कोर्ट ने साफ कहा कि प्रॉबेट के अधिकार को केवल देरी के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता। मामला अब दोबारा सुनवाई के लिए संबंधित सिविल कोर्ट को भेज दिया गया है।
क्या था मामला- 1995 की वसीयत और 2005 में आवेदन
यह मामला झारखंड के देवघर का है। श्रीलाल सिंघानिया ने 15 अप्रैल 1995 को एक वसीयत बनाई थी। इसके कुछ समय बाद 7 जून 1995 को उनका निधन हो गया।
करीब दस साल बाद 31 अगस्त 2005 को वसीयत के कार्यपालक (एक्जीक्यूटर) भूदेव प्रसाद सिंह ने प्रोबेट के लिए सिविल कोर्ट में अर्जी दाखिल की। यह अर्जी वसीयत के लाभार्थी संजय शर्मा @ संजय भारद्वाज के पक्ष में दायर की गई थी।
उनका कहना था कि वसीयत के अनुसार उन्हें कार्यपालक बनाया गया है, इसलिए उसे कानूनी मान्यता देने के लिए प्रोबेट जारी किया जाए।
लेकिन विरोधी पक्ष ने आवेदन का विरोध करते हुए कहा कि वसीयत बनाने वाले व्यक्ति की मौत के करीब दस साल बाद प्रोबेट की अर्जी दाखिल की गई है। इसलिए यह समय सीमा से बाहर है।
देवघर की जिला कोर्ट ने यह दलील स्वीकार कर ली और आवेदन खारिज कर दिया। बाद में झारखंड हाईकोर्ट ने भी यही फैसला बरकरार रखा। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
प्रोबेट क्या होता है? सुप्रीम कोर्ट ने कैसे समझाया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रोबेट सिर्फ वसीयत पर औपचारिक मुहर लगाने की प्रक्रिया नहीं है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि वसीयत असली और कानूनी रूप से वैध है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रोबेट के जरिए यह भी मान्यता मिलती है कि वसीयत में जिस व्यक्ति को उसकी जिम्मेदारी निभाने के लिए नियुक्त किया गया है, वही कानून के मुताबिक उस वसीयत को लागू कर सकता है।
यानी प्रोबेट मिलने के बाद ही कार्यपालक को वसीयत के अनुसार संपत्ति और दूसरे मामलों में कानूनी अधिकार मिलते हैं।
प्रोबेट और समय सीमा पर अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 में प्रोबेट के लिए आवेदन करने की कोई तय समय सीमा नहीं दी गई है। इसलिए ऐसे मामलों में लिमिटेशन एक्ट, 1963 की धारा 137 लागू होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 137 के तहत सामान्य तौर पर तीन साल की समय सीमा होती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर मामले में तीन साल की गिनती वसीयत बनाने वाले व्यक्ति की मौत की तारीख से ही शुरू होगी।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में कुछ अहम बातें भी साफ कीं–
- हर मामले में वसीयत बनाने वाले व्यक्ति की मौत के तीन साल के भीतर प्रोबेट की अर्जी देना जरूरी नहीं है।
- प्रोबेट का अधिकार एक निरंतर अधिकार है। जब तक वसीयत को लागू करने की जरूरत बनी रहती है, तब तक प्रोबेट मांगा जा सकता है।
- तीन साल की समय सीमा उस दिन से शुरू होगी, जब पहली बार प्रोबेट लेना वास्तव में जरूरी हो जाए।
- सिर्फ देरी के आधार पर प्रोबेट की अर्जी खारिज नहीं की जा सकती। पहले यह देखना होगा कि आवेदन की जरूरत आखिर कब पैदा हुई।
ऑर्डर VII रूल 11 पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सिविल प्रक्रिया संहिता के ऑर्डर 7 रूल 11 (Order VII Rule 11) के इस्तेमाल पर भी अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान के तहत किसी आवेदन को शुरुआती स्तर पर ही खारिज करना एक गंभीर कदम है। इसलिए इसका इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर किया जाना चाहिए।
सुप्रीम ने कहा कि अगर किसी मामले में यह तय करने के लिए तथ्यों की भी जांच करनी पड़े कि आवेदन समय सीमा के भीतर है या नहीं, तो उसे केवल शुरुआती स्तर पर खारिज नहीं किया जा सकता।
ऐसे मामलों में लिमिटेशन का सवाल सिर्फ कानून का नहीं रहता, बल्कि तथ्य और कानून, दोनों से जुड़ा होता है। इसलिए पक्षों को सबूत पेश करने और अपनी बात रखने का पूरा मौका देना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऑर्डर 7 रूल 11 की सुनवाई के दौरान वसीयत की सच्चाई या उसकी वैधता पर अंतिम टिप्पणी नहीं की जा सकती। ऐसे मामलों में पहले पूरी सुनवाई होगी, सबूतों और गवाहों की जांच होगी, उसके बाद ही यह तय किया जा सकता है कि वसीयत वैध है या नहीं।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देवघर की जिला कोर्ट और झारखंड हाईकोर्ट ने केवल शुरुआती स्तर पर ही प्रोबेट की अर्जी खारिज करके कानून की सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अर्जी को समय पर क्यों माना?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सबसे पहले यह देखना जरूरी था कि प्रोबेट लेने की जरूरत आखिर कब पैदा हुई।
रिकॉर्ड के मुताबिक, वसीयत बनाने वाले व्यक्ति की पत्नी लक्ष्मी देवी ने 8 अगस्त 2005 को एक जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए) जारी की। यह कदम वसीयत में बताए गए अधिकारों के विपरीत माना गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसी घटना के बाद पहली बार वसीयत के अधिकारों पर सीधा विवाद पैदा हुआ। इसलिए उसी समय प्रोबेट के लिए आवेदन करना जरूरी हो गया।
चूंकि प्रोबेट की अर्जी 31 अगस्त 2005 को दाखिल की गई थी, इसलिए इसे समय सीमा के भीतर माना जाएगा। केवल यह आधार पर्याप्त नहीं है कि वसीयत बनाने वाले व्यक्ति की मौत को कई साल बीत चुके थे।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट और देवघर की जिला कोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दोनों कोर्ट्स ने केवल देरी के आधार पर प्रोबेट की अर्जी खारिज कर दी, जबकि पहले यह देखना जरूरी था कि प्रोबेट की जरूरत कब पैदा हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ऑर्डर 7 रूल 11 के तहत सुनवाई करते समय वसीयत की वैधता और उससे जुड़े विवादित तथ्यों पर फैसला देना भी सही नहीं था।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने मामला दोबारा संबंधित सिविल कोर्ट को भेज दिया और निर्देश दिया कि अब इस पर कानून के मुताबिक पूरी सुनवाई की जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रोबेट के मामलों में केवल देरी को आधार बनाकर आवेदन खारिज नहीं किया जा सकता। पहले यह तय करना होगा कि प्रोबेट लेने का अधिकार वास्तव में कब पैदा हुआ।