नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मोटर इंश्योरेंस से जुड़े एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि अगर कोई भारतीय वाहन वैध परमिट के साथ नेपाल जैसे दूसरे देश में जाता है और वहां दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है, तो बीमा कंपनी सिर्फ यह कहकर मुआवजा देने से इनकार नहीं कर सकती कि हादसा भारत के बाहर हुआ है।
अगर पॉलिसी में ऐसी कोई रोक स्पष्ट शब्दों में नहीं लिखी गई है, तो उसका फायदा बीमा कंपनी नहीं उठा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि-
अगर बीमा कंपनी किसी तरह के जोखिम का बीमा नहीं देना चाहती, तो उसे यह बात पॉलिसी में साफ-साफ लिखनी होगी। बाद में अस्पष्ट या अधूरी शर्तों का हवाला देकर बीमाधारक का दावा खारिज नहीं किया जा सकता। अगर पॉलिसी की किसी शर्त को लेकर भ्रम की स्थिति हो, तो उसका फायदा बीमा कंपनी नहीं, बल्कि बीमाधारक को मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बीमा पॉलिसी की शर्तें ऐसी होनी चाहिए, जिन्हें आम व्यक्ति आसानी से समझ सके। अगर किसी जोखिम को बीमा कवर से बाहर रखा गया है, तो उसका साफ उल्लेख होना चाहिए।
बाद में शर्तों की अलग व्याख्या करके बीमा कंपनी अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती। ऐसी स्थिति में पॉलिसी का मतलब वही माना जाएगा, जो बीमाधारक के हित में हो।
इसी सिद्धांत को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया और ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी की अपील खारिज कर दी।
कोर्ट ने कहा कि नेपाल में बस दुर्घटना में मारे गए लोगों के परिजनों को मुआवजा देने की जिम्मेदारी बीमा कंपनी की ही होगी।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) को भी सुझाव दिया कि भविष्य में मोटर इंश्योरेंस पॉलिसियों में सीमा पार (क्रॉस बॉर्डर) कवरेज को लेकर एक समान और स्पष्ट नियम बनाए जाएं, ताकि ऐसे विवाद दोबारा न हों।
नेपाल में हुआ हादसा- सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
यह मामला वर्ष 2010 में छत्तीसगढ़ के दुर्ग से नेपाल जा रही एक धार्मिक यात्रा की बस से जुड़ा है।
बस को क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकरण ने मोटर वाहन कानून के तहत विशेष परमिट दिया था, जिससे उसे नेपाल तक जाने की अनुमति मिली थी। सीमा पर बस के सभी दस्तावेजों की जांच भी हुई और नेपाल में प्रवेश की मंजूरी भी दे दी गई।
यात्रा के दौरान नेपाल में बस एक पहाड़ी से टकरा गई। इस हादसे में चालक समेत तीन लोगों की मौत हो गई। मृतकों के परिवारों ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण में मुआवजे की मांग की।
ट्रिब्यूनल ने करीब 32.67 लाख रुपये का मुआवजा तो तय किया, लेकिन इसकी जिम्मेदारी बस मालिक पर डाल दी। ट्रिब्यूनल का मानना था कि बीमा कंपनी की पॉलिसी भारत के बाहर लागू नहीं होती।
बस मालिक ने इस फैसले को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल का फैसला पलट दिया और कहा कि मुआवजा बीमा कंपनी को देना होगा। इसके बाद ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
बीमा कंपनी ने दावा क्यों ठुकराया?
बीमा कंपनी का कहना था कि मोटर इंश्योरेंस पॉलिसी में “भौगोलिक क्षेत्र” (जियोग्राफिकल एरिया) के सामने केवल “भारत” लिखा था। इसलिए नेपाल में हुई दुर्घटना इस पॉलिसी के दायरे में नहीं आती।
कंपनी ने यह भी दलील दी कि नेपाल जैसे देशों में कवरेज बढ़ाने के लिए अलग से अतिरिक्त प्रीमियम देना पड़ता था, जो इस मामले में नहीं दिया गया। इसलिए कंपनी पर मुआवजा देने की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती।
बीमा कंपनी ने यह भी कहा कि चालक के पास नेपाल में वाहन चलाने का अलग से वैध लाइसेंस नहीं था। इसलिए यह पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन है और इसी आधार पर भी दावा खारिज किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने बीमा कंपनी की दलील क्यों खारिज की ?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी बीमा पॉलिसी को केवल एक शर्त पढ़कर नहीं समझा जा सकता। पूरी पॉलिसी को एक साथ पढ़ना होगा और सभी शर्तों का आपस में मेल बैठाकर ही उसका सही मतलब निकाला जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि पॉलिसी में एक तरफ “भौगोलिक क्षेत्र” में भारत लिखा था, लेकिन दूसरी तरफ साफ लिखा था कि पॉलिसी उन वाहनों को कवर करेगी, जो मोटर वाहन कानून के तहत वैध परमिट के साथ चल रहे हों।
इस मामले में बस के पास नेपाल जाने का विशेष परमिट था, जो क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकरण ने जारी किया था। इसलिए केवल यह कहकर बीमा कंपनी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती कि दुर्घटना भारत के बाहर हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर बीमा कंपनी वास्तव में नेपाल जैसे देशों में होने वाली दुर्घटनाओं को कवर नहीं करना चाहती थी, तो उसे पॉलिसी में यह बात साफ और स्पष्ट शब्दों में लिखनी चाहिए थी। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इसलिए अब अस्पष्ट भाषा का फायदा उठाकर दावा खारिज नहीं किया जा सकता।
पॉलिसी की अस्पष्ट शर्तों पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में बीमा कंपनियों के लिए एक अहम सिद्धांत भी स्पष्ट किया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बीमा पॉलिसी पूरी तरह बीमा कंपनी तैयार करती है। ग्राहक के पास उसकी शर्तें बदलने का कोई अधिकार नहीं होता।
ऐसे में अगर पॉलिसी की किसी शर्त का मतलब दो तरह से निकाला जा सकता है, तो उसका नुकसान ग्राहक को नहीं उठाना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में वही व्याख्या मानी जाएगी, जो बीमाधारक के हित में हो।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बीमा कंपनियां यह तय करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं कि वे किस जोखिम को कवर करना चाहती हैं और किसे नहीं। लेकिन अगर किसी जोखिम को बाहर रखना है, तो उसे पॉलिसी में साफ और स्पष्ट शब्दों में लिखना होगा। अस्पष्ट भाषा या अधूरी शर्तों के आधार पर बाद में दायित्व से बचने की कोशिश स्वीकार नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि बीमा कंपनी चाहे तो जिस जोखिम को चाहे कवर करे और जिसे चाहे बाहर रखे, लेकिन यह सब स्पष्ट होना चाहिए। अगर शर्तों का मसौदा लापरवाही से तैयार किया गया है, तो उसका परिणाम भी बीमा कंपनी को ही भुगतना होगा।
अतिरिक्त प्रीमियम नहीं देने की दलील भी ठुकराई
बीमा कंपनी ने यह भी तर्क दिया था कि नेपाल में कवरेज बढ़ाने के लिए उस समय लागू इंडिया मोटर टैरिफ के तहत अतिरिक्त प्रीमियम देना जरूरी था। चूंकि बस मालिक ने यह अतिरिक्त प्रीमियम नहीं दिया, इसलिए कंपनी पर कोई जिम्मेदारी नहीं बनती।
सुप्रीम कोर्ट ने यह दलील भी स्वीकार नहीं की। कोर्ट ने कहा कि-
मोटर वाहन कानून की धारा 147(5) साफ कहती है कि अगर बीमा पॉलिसी किसी जोखिम को कवर करती है, तो बीमा कंपनी उस दायित्व से पीछे नहीं हट सकती। यह प्रावधान दूसरे नियमों पर प्रभावी रहेगा। इसलिए केवल अतिरिक्त प्रीमियम न देने का आधार इस मामले में पर्याप्त नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बस के पास नेपाल जाने का वैध विशेष परमिट था। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि वाहन बिना अनुमति के भारत से बाहर गया था। ऐसी स्थिति में बीमा कंपनी की जिम्मेदारी बनी रहेगी।
चालक के लाइसेंस पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
बीमा कंपनी ने चालक के लाइसेंस पर भी सवाल उठाया था। उसका कहना था कि चालक के पास नेपाल में वाहन चलाने का अलग लाइसेंस नहीं था, इसलिए पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन हुआ।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि चालक के पास भारत का वैध ड्राइविंग लाइसेंस था। नेपाल सीमा पर संबंधित अधिकारियों ने उसके दस्तावेजों की जांच की थी और उसके बाद ही वाहन को प्रवेश की अनुमति दी गई थी।
नेपाल सरकार की ओर से जारी दस्तावेजों में भी चालक के लाइसेंस का विवरण दर्ज था। इससे साफ है कि वहां के अधिकारियों ने भी उसके लाइसेंस को स्वीकार किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने भारत-नेपाल शांति एवं मैत्री संधि, 1950 का भी जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि इस संधि के तहत दोनों देशों के नागरिकों को आवागमन सहित कई मामलों में विशेष सुविधाएं प्राप्त हैं।
बीमा कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि चालक का भारतीय लाइसेंस नेपाल में अमान्य था। इसलिए इस आधार पर भी दावा खारिज नहीं किया जा सकता।
आईआरडीएआई को सुप्रीम कोर्ट का सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीमा पार यात्रा करने वाले वाहनों के बीमा को लेकर आज भी स्पष्ट नियमों का अभाव है। इससे बीमा कंपनियों और वाहन मालिकों के बीच अनावश्यक विवाद पैदा होते हैं और सबसे ज्यादा नुकसान दुर्घटना पीड़ितों को उठाना पड़ता है।
इसी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आईआरडीएआई को तीन अहम सुझाव दिए—
- मोटर इंश्योरेंस पॉलिसी की भाषा पूरी तरह साफ और बिना किसी भ्रम वाली हो।
- अगर विदेश में कवरेज नहीं है, तो यह बात पॉलिसी में स्पष्ट लिखी जाए और ग्राहक को अलग से कवरेज लेने की जानकारी भी दी जाए।
- आईआरडीएआई ऐसी मास्टर गाइडलाइन जारी करने पर विचार करे, जिससे सभी मोटर इंश्योरेंस पॉलिसियों में सीमा पार बीमा कवरेज से जुड़ी शर्तें एक जैसी हों।
मोटर दुर्घटना दावा अधिकरणों को भी दी नसीहत
फैसले के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरणों (एमएसीटी) के कामकाज पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में अधिकरण सभी दलीलें और सबूत तो दर्ज कर लेते हैं, लेकिन अंतिम निष्कर्ष तक कैसे पहुंचे, इसका स्पष्ट कारण नहीं बताते।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में आदेश तर्कसंगत और स्पष्ट होने चाहिए। इससे अपीलों की संख्या कम होगी और पीड़ितों को जल्द न्याय मिल सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी की अपील खारिज कर दी और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में बस मालिक के बजाय बीमा कंपनी ही मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार होगी।
साथ ही निर्देश दिया कि अगर मुआवजे की राशि अभी तक जमा नहीं की गई है, तो बीमा कंपनी चार सप्ताह के भीतर पूरी राशि ब्याज सहित जमा करे। अगर राशि पहले से जमा है, तो उसे तुरंत मृतकों के परिजनों को जारी किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस आदेश की कॉपी आईआरडीएआई को भी भेजने का निर्देश दिया, ताकि वह सीमा पार मोटर बीमा कवरेज को लेकर आवश्यक कदमों पर विचार कर सके।