नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में सड़कों और हाईवे पर घूम रहे आवारा गोवंश से होने वाले हादसों पर गंभीर चिंता जताई है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि ऐसे हादसों में घायल या जान गंवाने वाले लोगों के लिए मुआवजा देने की स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए।
साथ ही पशुओं की टैगिंग, शेल्टर बढ़ाने और मौजूदा कानूनों को सख्ती से लागू करने के लिए भी कदम उठाए जाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सड़कों पर घूम रहे आवारा पशु अब अपवाद नहीं, बल्कि देशभर में एक गंभीर समस्या बन चुके हैं।
इससे हर साल बड़ी संख्या में लोगों की जान जा रही है और पशु भी हादसों का शिकार हो रहे हैं। इसलिए इस समस्या को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर की नीति के जरिए हल करने की जरूरत है।
यह टिप्पणी जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने एक महिला की अपील पर सुनवाई के दौरान की। महिला के पति की वर्ष 2007 में पंजाब के संगरूर में एक आवारा सांड के हमले में मौत हो गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का फैसला पलटते हुए पीड़ित परिवार को 15 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
किस मामले में आया फैसला?
यह मामला पंजाब के संगरूर जिले से जुड़ा है, जहां वर्ष 2007 में एक व्यक्ति पर आवारा सांड ने हमला कर दिया था, जिससे उसकी मौत हो गई।
मृतक की पत्नी ने मुआवजे की मांग को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ी।
मृतक की पत्नी निशा ने मुआवजे की मांग की थी। पहले उन्हें राहत मिली, लेकिन बाद में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने यह कहते हुए मुआवजा रद्द कर दिया कि मामले में तथ्यों पर विवाद है और इसके लिए दीवानी कोर्ट जाना होगा।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए कहा कि लगभग दो दशक बाद पीड़ित परिवार को सिविल मुकदमे में भेजना उन्हें “बिना किसी राहत के छोड़ने” जैसा होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि घटना को लेकर कोई विवाद नहीं था और इस आधार पर पीड़िता को सीधे मुआवजा देने का आदेश दिया गया।
सड़कों पर पशु ‘नेचुरल स्पीड ब्रेकर’ नहीं
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि सड़कों और हाईवे पर घूम रहे मवेशियों को “नेचुरल स्पीड ब्रेकर” की तरह नहीं छोड़ा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह की स्थिति प्रशासनिक लापरवाही को दिखाती है और इसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सड़कों पर इस तरह से घूमते मवेशी इंसानों और पशुओं, दोनों की जान के लिए खतरा है।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि हाल के वर्षों में हर साल 1300 से ज्यादा लोगों की मौत पशुओं के हमलों या उनसे जुड़े हादसों में हुई है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आवारा गोवंश से जुड़े हादसे अब इक्का-दुक्का नहीं रहे, बल्कि देशभर में आम हो चुके हैं।
इसलिए इसे केवल अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय राष्ट्रीय स्तर की चुनौती मानते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर ठोस नीति बनानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारों को केवल हादसे के बाद कार्रवाई करने के बजाय ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनानी होगी।
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आवारा गोवंश की समस्या की असली वजह
सुप्रीम कोर्ट ने इस समस्या की जड़ पर भी खुलकर बात की। कोर्ट ने कहा कि अक्सर मवेशियों को तब छोड़ दिया जाता है जब वे आर्थिक रूप से उपयोगी नहीं रह जाते।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आवारा गोवंश की समस्या की सबसे बड़ी वजह यही है कि कई लोग गाय, बैल और दूसरे पशुओं के बूढ़े होने या आर्थिक रूप से उपयोगी नहीं रहने पर उन्हें बेसहारा छोड़ देते हैं।
इसके बाद यही पशु सड़कों और हाईवे पर घूमते रहते हैं, जिससे लोगों और पशुओं, दोनों के लिए हादसों का खतरा बढ़ जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि कई किसानों और डेयरी संचालकों के लिए सभी पशुओं का पालन-पोषण करना आर्थिक रूप से आसान नहीं होता।
इसके बावजूद, यदि कोई व्यक्ति पशु पालता है तो उसकी जिम्मेदारी केवल तब तक नहीं रहती, जब तक उससे आय हो रही हो।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जो लोग मवेशी पालते हैं, उनकी जिम्मेदारी है कि वे पूरे जीवन उनकी देखभाल करें।
यदि कोई पशु बूढ़ा हो जाए या किसी काम का न रहे, तब भी मालिक उसे सड़क पर बेसहारा छोड़ नहीं सकता। उसकी जिम्मेदारी है कि वह ऐसे पशु को सुरक्षित तरीके से अधिकृत शेल्टर या गौशाला तक पहुंचाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समाज एक तरफ अनुपयोगी हो चुके पशुओं को खुला छोड़ देता है, जबकि दूसरी तरफ उनके प्रबंधन के दूसरे तरीकों पर भी आपत्ति जताई जाती है।
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, यह विरोधाभास भी आवारा गोवंश की समस्या बढ़ने की एक वजह है।
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संविधान और कानूनों का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कई संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों का जिक्र किया।
इसमें संविधान के अनुच्छेद 48 और 51A(g) के साथ-साथ पशु क्रूरता निवारण कानून और अन्य संबंधित कानून शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई राज्यों ने मवेशियों के संरक्षण, गौशालाओं और आश्रय स्थलों को लेकर कानून बनाए हैं, लेकिन इनका सही तरीके से पालन नहीं हो रहा है।
यही कारण है कि आवारा मवेशियों की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका जमीन पर प्रभावी क्रियान्वयन होना जरूरी है।
जब तक प्रशासनिक स्तर पर जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक इस समस्या का समाधान संभव नहीं है।
राज्यों और केंद्र सरकार को दिए 5 सुझाव
समस्या के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को कई अहम सुझाव दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि इन उपायों को गंभीरता से लागू किया जाए, तो हादसों को काफी हद तक रोका जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने ये सुझाव दिए—
- पहला- जिन राज्यों में गोवंश से जुड़े कानून पहले से लागू हैं, वहां उनका पूरी सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।
- दूसरा- सड़क हादसों या पैदल चलने वालों के साथ गोवंश से जुड़े हादसों में पीड़ितों को मुआवजा देने की स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए। जरूरत हो तो कानून या नियमों में बदलाव किया जाए।
- तीसरा- सभी पशुओं की अनिवार्य टैगिंग की जाए ताकि उनकी पहचान, स्वास्थ्य जांच, टीकाकरण और रिकॉर्ड आसानी से रखा जा सके।
- चौथा- जो लोग अपने पशुओं को छोड़ देते हैं, उन्हें उनकी सुरक्षित तरीके से सरकारी या अधिकृत शेल्टर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी दी जाए। शेल्टर प्रशासन ऐसे पशुओं की रसीद जारी करे और उनका रिकॉर्ड डिजिटल डाटाबेस में दर्ज करे।
- पांचवां- हर नगर निकाय या संबंधित विभाग में एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए, जो टैगिंग, डिजिटल रिकॉर्ड और शेल्टर व्यवस्था की निगरानी करे।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस फैसले की प्रति सभी राज्यों के मुख्य सचिवों, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को भेजी जाए, ताकि कोर्ट की सिफारिशों पर उचित कार्रवाई की जा सके।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस फैसले की प्रति सभी राज्यों के मुख्य सचिवों, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासकों और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों को भेजी जाए, ताकि कोर्ट की सिफारिशों पर उचित कार्रवाई की जा सके।
परिवार को मुआवजा देने का आदेश
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस घटना को करीब दो दशक बीत चुके हैं।
ऐसे में पीड़ित परिवार को मुआवजे के लिए अब दीवानी कोर्ट जाने के लिए कहना उचित नहीं होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि संबंधित सरकारी अधिकारियों ने कभी यह विवाद नहीं किया कि घटना हुई ही नहीं थी।
इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मृतक की पत्नी को 15 लाख रुपये एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा कि यह राशि चार सप्ताह के भीतर अदा की जाए।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यह मुआवजा इस मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए दिया गया है।
इसलिए इसे भविष्य के हर मामले में लागू होने वाला सामान्य नियम या नजीर नहीं माना जाएगा।