जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने RGHS में कथित फर्जीवाड़े और सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने के मामले में 2 डॉक्टरों को जमानत देने से इनकार कर दिया है।
जस्टिस चंद्र प्रकाश श्रीमाली ने डॉ. कमल कुमार उर्फ के.के. अग्रवाल और डॉ. बनवारी लाल उर्फ बी. लाल की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि डॉक्टरों का समाज में सम्मानित स्थान होता है और सरकारी स्वास्थ्य योजना में इस तरह का फर्जीवाड़ा पूरी चिकित्सा व्यवस्था और आम लोगों के भरोसे को नुकसान पहुंचाता है।
मामले में डॉ. कमल कुमार उर्फ के.के. अग्रवाल और डायग्नोस्टिक सेंटर के साझेदार डॉ. बनवारी लाल उर्फ बी. लाल ने जमानत के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था।
लेकिन हाईकोर्ट ने दोनों की जमानत खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट को मामले की सुनवाई में तेजी लाने के निर्देश भी दिए।
दोनों पर आरोप है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मरीजों के नाम पर जांच और इलाज से संबंधित भुगतान हासिल किए गए।
मामले में फर्जी रिकॉर्ड के जरिए MRI और CT स्कैन जैसी जांचों के भुगतान का भी आरोप लगाया गया है।
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1,390 मरीजों के नाम पर फर्जी पर्चियां
इस मामले में राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राजेश चौधरी और एजीसी मानवेंद्र सिंह शेखावत ने पक्ष रखा।
जमानत का विरोध करते हुए राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट को मामले की गंभीरता और कथित फर्जीवाड़े के बारे में जानकारी दी गई।
सरकार के मुताबिक, सितंबर 2023 से अगस्त 2025 के बीच RGHS के 1,390 लाभार्थियों के नाम पर फर्जी परामर्श पर्चियां तैयार की गईं।
आरोप है कि इन फर्जी पर्चियों और रिकॉर्ड के आधार पर मरीजों के नाम पर जांच और इलाज से जुड़े भुगतान हासिल किए गए।
मामले में MRI और CT स्कैन जैसी जांचों के लिए भी फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भुगतान लेने का आरोप है।
सरकारी पक्ष के मुताबिक, इन फर्जी रिकॉर्ड के आधार पर डायग्नोस्टिक सेंटर को RGHS से करीब 1.30 करोड़ रुपए का भुगतान किया गया।
यानी सिर्फ एक सेंटर से जुड़े कथित फर्जी भुगतान का आंकड़ा ही करोड़ों रुपए में है।
वहीं, सरकारी पक्ष ने हाईकोर्ट को बताया कि यह मामला सिर्फ 1.30 करोड़ रुपए के भुगतान तक सीमित नहीं है।
पूरे मामले में अलग-अलग तरीकों से राज्य सरकार को करीब 7 करोड़ रुपए की आर्थिक हानि पहुंचाने का आरोप है।
इन्हीं तथ्यों का हवाला देते हुए राज्य सरकार ने आरोपियों की जमानत का विरोध किया और कहा कि मामले में सरकारी स्वास्थ्य योजना के तहत फर्जी रिकॉर्ड तैयार कर भुगतान हासिल करने के गंभीर आरोप हैं।
कोर्ट ने आरोपियों की दलील ठुकराई
जमानत याचिका में आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि वे काफी समय से न्यायिक अभिरक्षा में हैं और पुलिस जांच भी पूरी हो चुकी है।
मामले में आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है। ऐसे में अब उन्हें जेल में रखने का कोई ठोस आधार नहीं है और उन्हें जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए।
वहीं, सरकार की ओर से जमानत का विरोध किया गया।
सरकारी पक्ष ने मामले में लगाए गए आरोपों, फर्जी पर्चियों और रिकॉर्ड के आधार पर हुए भुगतान के साथ-साथ राज्य सरकार को हुए कथित आर्थिक नुकसान का हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मामले में लगे आरोपों और राज्य सरकार को हुए कथित आर्थिक नुकसान को देखते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया।
हाईकोर्ट ने आरोपियों की ओर से रखी गई जमानत की दलीलों को स्वीकार नहीं किया और दोनों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।
यानी आरोप पत्र दाखिल होने और आरोपियों के लंबे समय से न्यायिक अभिरक्षा में होने के बावजूद फिलहाल उन्हें जेल से बाहर आने की राहत नहीं मिली।
हाईकोर्ट ने क्यों नहीं दी राहत?
सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों को जमानत देने से इनकार कर दिया।
हाईकोर्ट ने RGHS जैसी सरकारी स्वास्थ्य योजना में फर्जी रिकॉर्ड तैयार किए जाने को गंभीरता से लिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि डॉक्टरों का समाज में एक सम्मानित स्थान होता है। ऐसे में स्वास्थ्य योजना में फर्जीवाड़ा सिर्फ सरकारी पैसे के नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे पूरी चिकित्सा व्यवस्था और आम लोगों के भरोसे पर भी असर पड़ता है।
हाईकोर्ट ने इसी आधार पर डॉ. कमल कुमार और डॉ. बनवारी लाल की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।
ट्रायल में तेजी के निर्देश
हाईकोर्ट ने जमानत याचिकाएं खारिज करने के साथ ट्रायल कोर्ट को मामले की सुनवाई में तेजी लाने के निर्देश भी दिए हैं।
यानी फिलहाल दोनों आरोपियों को हाईकोर्ट से जमानत नहीं मिली है और मामले की आगे की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में जारी रहेगी।
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को मामले की सुनवाई के लिए नजदीकी तारीखें तय करने और गवाहों की मौजूदगी सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
साथ ही महत्वपूर्ण गवाहों के बयान प्राथमिकता से दर्ज करने और मामले की सुनवाई जल्द पूरी करने की कोशिश करने को कहा है।
मामले में लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि ट्रायल के दौरान सबूतों के आधार पर होगी।