जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने आदर्श क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी से जुड़े संपत्ति विवाद में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए रिटायर्ड चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस संजीव खन्ना को विवादों के निपटारे के लिए वन-मैन कमीशन के रूप में नियुक्त करने संबंधी एकलपीठ के आदेश को रद्द कर दिया है।
हालांकि, अदालत ने विवादित संपत्तियों पर पहले से लागू अटैचमेंट और स्टेटस-को के अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार किया है। 9 जुलाई 2026 को संपत्तियां जिस स्थिति में थीं, वही स्थिति बनी रहेगी।
साथ ही लिक्विडेटर को अंतरिम आदेश के जरिए संपत्तियों के मालिक का नाम बदलने की कार्रवाई नहीं करने को कहा गया है।
संपत्तियों के अटैचमेंट की वैधता और लिक्विडेटर के अधिकार का अंतिम फैसला अभी एकलपीठ को करना है।
जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने एकलपीठ के खिलाफ दायर मेघा टाक की ओर से दायर स्पेशल अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया हैं.
साथ ही खंडपीठ ने मामले को फिर से वापस एकलपीठ के पास भेजते हुए पेडिंग रिट याचिकाओं में संपत्तियों के मालिकाना हक, अटैचमेंट की वैधता और लिक्विडेटर के अधिकार से जुड़े मूल विवादों पर सुनवाई करने को कहा हैं.
मामले में याचिकाकर्ता मेघा टाक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रवि भंसाली, संदीप सिंह शेखावत, विपुर धर्निया और अंकुर माथुर ने की.
पूर्व CJI को कमीशन बनाने पर क्यों लगी रोक?
विवादित संपत्तियों को लेकर रिट याचिकाएं पहले से ही हाईकोर्ट की एकलपीठ के सामने लंबित थीं। इन मामलों में संपत्तियों पर अटैचमेंट और उनकी मौजूदा स्थिति बनाए रखने के लिए अंतरिम आदेश भी दिए जा चुके थे।
इसके बाद 28 जुलाई 2026 को एकलपीठ ने सेवानिवृत्त चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस संजीव खन्ना की अध्यक्षता में एक विशेष समिति बनाई।
इस समिति को पक्षों के बीच संपत्तियों को लेकर दावों और आपत्तियों का निपटारा करना था।
इस आदेश को चुनौती देते हुए विशेष अपीलें डिवीजन बेंच के सामने पहुंचीं।
अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रवि भंसाली ने कहा कि इस तरह किसी सेवानिवृत्त चीफ जस्टिस को विवाद का फैसला करने की जिम्मेदारी देने की व्यवस्था कानून के मुताबिक नहीं है।
डिवीजन बेंच ने 28 जुलाई के आदेश की जांच की तो उसमें पक्षों के बीच ऐसी कोई खास सहमति दर्ज नहीं मिली, जिसके आधार पर जस्टिस संजीव खन्ना को विवाद निपटाने की जिम्मेदारी दी गई हो।
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे विवादों के निपटारे के लिए कानून में पहले से अलग मंच और प्रक्रिया तय हैं।
तीसरे पक्ष की संपत्तियों पर भी उठा सवाल
अपीलकर्ताओं की ओर से कोर्ट में एक और अहम सवाल उठाया गया। उनका कहना था कि जिन संपत्तियों को अटैच किया गया है, उनमें कुछ तीसरे पक्ष की संपत्तियां हैं।
ऐसी संपत्तियों को अटैच करने का अधिकार लिक्विडेटर के पास नहीं है।
इस दलील के समर्थन में हाईकोर्ट के ही एक पुराने फैसले कला चौहान बनाम राजस्थान सरकार एवं अन्य का हवाला दिया गया।
इस मामले में कोर्ट ने कहा था कि तीसरे पक्ष की संपत्तियों के मामले में लिक्विडेटर के पास अटैचमेंट की शक्ति नहीं है।
हालांकि, इस मामले में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस सवाल पर अभी कोई अंतिम राय नहीं दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि अटैचमेंट की वैधता का सवाल पहले से ही एकलपीठ के सामने लंबित है।
इसलिए अभी यह तय करना सही नहीं होगा कि लिक्विडेटर ने जिस तरीके से कार्रवाई की, वह कानूनी तौर पर सही थी या नहीं।
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अटैचमेंट और स्टेटस-क्वो में राहत नहीं
हाईकोर्ट ने वन मैन कमीशन बनाने वाला आदेश रद्द कर दिया, लेकिन विवादित संपत्तियों पर पहले से लगे अटैचमेंट और स्टेटस-क्वो के आदेश को हटाने से इनकार कर दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि संपत्तियों को फिलहाल सुरक्षित रखना जरूरी है, क्योंकि इनके मालिकाना हक और अटैचमेंट से जुड़े मूल सवालों पर हाईकोर्ट की एकलपीठ में सुनवाई अभी बाकी है।
इसलिए डिवीजन बेंच के इस आदेश के बाद भी विवादित संपत्तियों की स्थिति नहीं बदलेगी।
9 जुलाई 2026 को संपत्तियां जिस स्थिति में थीं, वही स्थिति आगे भी बनी रहेगी।
साथ ही, हाईकोर्ट ने साफ किया कि संपत्तियों से जुड़े लंबित रिट मामलों में ही इन विवादों का अंतिम फैसला किया जाएगा।
मालिक का नाम बदलने पर भी रोक
हाईकोर्ट ने संपत्तियों के मालिकाना हक से जुड़े एक और अहम पहलू को भी साफ किया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब संपत्तियों के मालिकाना हक और अटैचमेंट को लेकर मामला अभी लंबित है, तब लिक्विडेटर को अंतरिम आदेश के जरिए संपत्ति के मालिक का नाम बदलने का निर्देश नहीं दिया जा सकता।
हाईकोर्ट ने इसलिए 9 जुलाई 2026 को संपत्तियों की जो स्थिति थी, उसे आगे भी बनाए रखने का आदेश दिया है।
यानी फिलहाल संपत्तियों में ऐसा कोई बदलाव नहीं किया जाएगा, जिससे लंबित मामले के अंतिम फैसले पर असर पड़े।
सोसायटी की संपत्तियों पर क्या है विवाद?
मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव सोसायटीज एक्ट, 2002 में बंद हो चुकी सोसायटी की संपत्तियों और उनकी वसूली के लिए अलग व्यवस्था है।
सोसायटी के लिए लिक्विडेटर नियुक्त होने के बाद उसकी संपत्तियां लिक्विडेटर के नियंत्रण में आती हैं।
इस मामले में विवाद इस बात को लेकर है कि जिन संपत्तियों को अटैच किया गया, क्या वे वास्तव में सोसायटी के पैसों से खरीदी गई थीं।
इसी दावे के आधार पर लिक्विडेटर ने इन संपत्तियों को अटैच करने की कार्रवाई की।
वहीं, अपील करने वालों का कहना है कि ये तीसरे पक्ष की संपत्तियां हैं और इन्हें अटैच करने का लिक्विडेटर को अधिकार नहीं था।
अब इन संपत्तियों को लेकर असली विवाद यही है कि उनका मालिकाना हक किसका है और लिक्विडेटर को उन्हें अटैच करने का कानूनी अधिकार था या नहीं।
इन सवालों पर लंबित रिट याचिकाओं में हाईकोर्ट को अंतिम फैसला करना है।
अब लंबित मामलों पर होगा फैसला
डिवीजन बेंच ने साफ किया कि उसके इस आदेश से संपत्तियों के मालिकाना हक या अटैचमेंट की वैधता पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है।
इन दोनों मुद्दों पर हाईकोर्ट में रिट याचिकाएं पहले से लंबित हैं।
इसी वजह से डिवीजन बेंच ने वन मैन कमीशन बनाने वाला आदेश रद्द कर दिया और संबंधित मामले वापस हाईकोर्ट में लंबित रिट याचिकाओं के साथ आगे बढ़ाने को कहा।
इन मामलों में ही संपत्तियों के मालिकाना हक और अटैचमेंट से जुड़े सवालों पर अंतिम फैसला होगा।
यानी इस आदेश के बाद फिलहाल विवादित संपत्तियों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं होगा।
लिक्विडेटर को इन्हें अटैच करने का अधिकार था या नहीं, तीसरे पक्ष की संपत्तियों को अटैच किया जा सकता है या नहीं और मालिकाना हक किसका है-इन सवालों का फैसला अभी बाकी है।
फिलहाल इतना तय हो गया है कि इन विवादों का निपटारा वन मैन कमीशन के जरिए नहीं होगा।
मूल विवाद पर फैसला हाईकोर्ट में लंबित रिट याचिकाओं के जरिए ही होगा।