नई दिल्ली। दहेज हत्या और शादीशुदा महिला से क्रूरता के मामलों में सालों तक चलने वाले मुकदमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों की सुनवाई को तेज करने के लिए कई निर्देश दिए हैं।
साथ ही चार्जशीट दाखिल होने के बाद 60 से 90 दिन के भीतर आरोप तय करने की कोशिश करने को कहा गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोप तय होने के बाद गवाही की प्रक्रिया भी जल्द शुरू होनी चाहिए और जहां संभव हो, गवाहों की सुनवाई लगातार कराई जाए।
इसका मकसद यह है कि गंभीर मामलों में पीड़ित परिवार को न्याय के लिए सालों तक इंतजार न करना पड़े और मुकदमे सिर्फ तारीखों के चलते लंबित न रहें।
सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर तीन साल से ज्यादा पुराने मामलों की पहचान करने और उनकी स्थिति पर नजर रखने को कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि किसी आपराधिक मामले में लंबे समय तक सुनवाई न होना न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित करता है। इसलिए पुराने मामलों को प्राथमिकता देकर आगे बढ़ाने की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार सुनवाई टलने पर भी चिंता जताई। कहा कि अगर किसी मामले में तारीख देना जरूरी हो तो उसकी वजह रिकॉर्ड में दर्ज होनी चाहिए।
अनावश्यक स्थगन को सामान्य प्रक्रिया नहीं बनाया जा सकता। गवाहों की सुनवाई पहले से तय करने के लिए विटनेस कैलेंडर बनाने पर भी जोर दिया गया है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह आदेश द स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम अजमल बेग मामले में दिया।
यह पूरा मामला एक ऐसे दहेज हत्या केस से सामने आया, जिसकी न्यायिक प्रक्रिया को अंतिम नतीजे तक पहुंचने में करीब 24 साल लग गए।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी देरी को गंभीरता से लेते हुए देशभर में दहेज हत्या और क्रूरता के मामलों की सुनवाई को तेज करने के लिए नए निर्देश जारी किए हैं।
24 साल में पूरा हुआ था मामला
इस मामले की जड़ सुप्रीम कोर्ट के 15 दिसंबर 2025 के फैसले से जुड़ी है। उस समय कोर्ट ने एक दहेज हत्या और क्रूरता के मामले में निचली अदालत की ओर से दी गई सजा को बहाल किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि यह मामला 2001 में शुरू हुआ था और अंतिम फैसले तक पहुंचने में करीब 24 साल लग गए।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अगर एक दहेज से जुड़ा मुकदमा इतने लंबे समय तक चल सकता है तो ऐसे दूसरे मामलों में भी देरी की समस्या हो सकती है।
इसी वजह से कोर्ट ने ऐसे मामलों की जांच और सुनवाई में तेजी लाने के लिए आगे के निर्देश दिए।
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3 साल पुराने केस पहले चिन्हित होंगे
सुप्रीम कोर्ट ने जिला अदालतों को ऐसे मामलों की पहचान करने को कहा है जो तीन साल से ज्यादा समय से लंबित हैं।
खास तौर पर उन मुकदमों पर नजर रखने को कहा गया है जो आरोप तय होने या गवाही दर्ज होने के चरण पर लंबे समय से अटके हुए हैं। ऐसे मामलों की समय-समय पर समीक्षा करनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने दहेज हत्या और शादीशुदा महिला से क्रूरता से जुड़े मामलों को जहां तक संभव हो, प्राथमिकता वाले केस के तौर पर लेने को कहा है।
60-90 दिन में आरोप तय करने की कोशिश
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में सबसे अहम बात चार्जशीट के बाद आरोप तय करने की प्रक्रिया से जुड़ी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद आरोपी की कोर्ट में मौजूदगी जल्द सुनिश्चित की जाए और 60 से 90 दिन के भीतर आरोप तय करने का प्रयास किया जाए। इसके बाद गवाही भी उचित समय के भीतर शुरू होनी चाहिए।
हालांकि यह समयसीमा हर मामले में सख्ती से लागू होने वाला नियम नहीं है। कई आरोपी होने, सप्लीमेंट्री चार्जशीट, फॉरेंसिक जांच में देरी या आरोपी के उपलब्ध नहीं होने जैसी परिस्थितियों में समय बढ़ सकता है।
तारीख देनी पड़े तो वजह लिखनी होगी
मुकदमों में बार-बार तारीख मिलने की समस्या पर भी सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बेवजह स्थगन यानी तारीख देने से बचना होगा। अगर किसी मामले में स्थगन देना जरूरी हो तो उसका कारण लिखित रूप में दर्ज किया जाए।
आरोप तय होने के बाद गवाहों की सुनवाई को व्यवस्थित करने के लिए विटनेस कैलेंडर बनाने को भी कहा गया है।
इसका मकसद गवाहों की गवाही के लिए बार-बार तारीख लगने से होने वाली देरी को कम करना है।
पुराने मामलों पर डिजिटल नजर
सुप्रीम कोर्ट ने पुराने और लंबित मामलों की निगरानी के लिए तकनीक के इस्तेमाल पर भी जोर दिया है।
हाईकोर्ट को मौजूदा कोर्ट टेक्नोलॉजी सिस्टम में डिजिटल डैशबोर्ड और ऑटोमेटेड अलर्ट जैसी व्यवस्था जोड़ने की दिशा में प्रयास करने को कहा गया है।
इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि कोई मामला किस चरण पर है और कितने समय से लंबित है।
महिलाओं के लिए व्यवस्था मजबूत करने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने केवल मुकदमों की सुनवाई तेज करने की बात नहीं कही। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को महिलाओं की मदद से जुड़ी मौजूदा व्यवस्थाओं को मजबूत करने के निर्देश भी दिए हैं।
इनमें वन स्टॉप सेंटर, फैमिली काउंसलिंग सेंटर, महिला हेल्प डेस्क, पीड़ित सहायता व्यवस्था, हेल्पलाइन और ऑनलाइन शिकायत व्यवस्था शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने दहेज, महिलाओं के अधिकार, लैंगिक समानता और संवैधानिक मूल्यों को लेकर लगातार जागरूकता अभियान चलाने पर भी जोर दिया।
हर साल तीन बार देनी होगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ऐसे मामलों की स्थिति पर नियमित रिपोर्ट देने को कहा है।
रिपोर्ट में लंबित और निपटाए गए मामलों की संख्या, मामले किस चरण पर हैं, दहेज निषेध अधिकारियों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रमों की जानकारी देनी होगी।
यह रिपोर्ट 15 जनवरी, 15 मई और 15 सितंबर को दाखिल करनी होगी। यह व्यवस्था तब तक जारी रहेगी, जब तक संबंधित मामलों की लंबित संख्या में पर्याप्त कमी नहीं आती।
मामले को अगली बार 15 अक्टूबर 2026 को रिपोर्ट के साथ सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।
‘न्याय में देरी नहीं होनी चाहिए’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दहेज हत्या और शादीशुदा महिला से क्रूरता के मुकदमे सालों तक सिर्फ तारीखों में नहीं उलझने चाहिए। गंभीर आपराधिक मामलों में मुकदमे की प्रक्रिया समय पर आगे बढ़ना जरूरी है।
कोर्ट ने तीन साल से पुराने मामलों की पहचान करने, चार्जशीट के बाद 60 से 90 दिन में आरोप तय करने की कोशिश करने और गवाही जल्द शुरू कराने पर जोर दिया है। साथ ही बेवजह सुनवाई टालने से बचने को कहा है।
हालांकि 60 से 90 दिन की अवधि को हर मामले के लिए कठोर समयसीमा नहीं माना गया है। मामले की परिस्थितियों के अनुसार ज्यादा समय लग सकता है, लेकिन अनावश्यक देरी को सामान्य प्रक्रिया नहीं बनाया जा सकता।