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राजस्थान हाईकोर्ट वीकली डाइजेस्ट पांचवां सप्ताह -2026 | सरल हिंदी में

Rajasthan High Court Weekly Digest – 5th Week of 2026 | Major Court Highlights in Simple Words

जयपुर/जोधपुर, फरवरी । वर्ष 2026 में पांचवे न्यायिक सप्ताह में राजस्थान हाईकोर्ट ने कई अहम फैसले सुर्खियों में रहें है।

यहां जानिए पांचवें सप्ताह (1 से 7 फरवरी 2026) के प्रमुख रिपोर्टेबल और ऐतिहासिक महत्व के न्यायिक फैसले।

इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों क्लोन कॉपी पाने का अधिकार

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में स्पष्ट किया कि अपराधिक मामले में एक आरोपी के खिलाफ अभियोजन पक्ष द्वारा जिन दस्तावेज़ों और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर चार्जशीट दाखिल की जाती है, उनकी संपूर्ण प्रतियां अभियुक्त को उपलब्ध कराना कानूनन अनिवार्य है। इसमें डिजिटल साक्ष्यों की क्लोन कॉपी भी शामिल है।

हाईकोर्ट ने इसे निष्पक्ष सुनवाई और अभियुक्त के संवैधानिक अधिकार माना।

पिजन होल थ्योरी की सीमा की स्पष्ट

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने साक्ष्य कानून और निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों पर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि किसी गवाह से जिरह (Cross Examination) के दौरान केवल दस्तावेज़ के हस्ताक्षर वाले हिस्से को दिखाना और बाकी सामग्री को छिपाना न्यायिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

जस्टिस संजीत पुरोहित की एकल पीठ ने इस पद्धति को “भ्रामक और छलपूर्ण” बताते हुए “पिजन होल थ्योरी” या “विंडो मेथड” के प्रयोग की स्पष्ट सीमाएँ तय की हैं।

सक्षम प्राधिकारी के बिना बर्खास्तगी अवैध

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग में कार्यरत एक शिक्षक की सेवा समाप्ति को लेकर महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि किसी भी कर्मचारी को सेवा से हटाने से पहले सक्षम प्राधिकारी द्वारा विधिवत और सुनियोजित निर्णय लिया जाना आवश्यक है।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि प्रशासनिक जल्दबाजी या अधिकार क्षेत्र से बाहर पारित आदेश कानून की कसौटी पर खरे नहीं उतरते, इसलिए ऐसे आदेश स्वतः अमान्य माने जाएंगे।

अदालतें जांच की दिशा बता सकती हैं, तरीका नहीं

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने एक आपराधिक मामले में स्पष्ट किया है कि अदालत आगे की जांच (Further Investigation) का आदेश तो दे सकती है, लेकिन जांच किस तरीके से की जाए, यह अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।

हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत जांच एजेंसी को किसी विशेष दिशा में जांच करने या किसी विशेष प्रकार का साक्ष्य एकत्र करने का आदेश नहीं दे सकती। ऐसा करना जांच एजेंसी के अधिकार क्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप माना जाएगा।

नीच’ शब्द कहना SC/ST एक्ट लगाने के लिए पर्याप्त नहीं,

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने SC/ST एक्ट के दुरुपयोग और उसके लागू होने की शर्तों को लेकर ऐतिहासिक व रिपोर्टेबल फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि केवल ‘नीच’ शब्द कहना एक्ट की धाराएं लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बंद कमरे या सीमित कर्मचारियों की मौजूदगी में हुई घटना को “पब्लिक व्यू” नहीं माना जा सकता।

तरिम भरण-पोषण का उद्देश्य मुकदमे के दौरान आर्थिक कठिनाई से राहत देना

राजस्थान हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि अंतरिम भरण-पोषण का उद्देश्य मुकदमे के दौरान आर्थिक राहत देना है, न कि अंतिम अधिकार तय करना।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक निचली अदालतों द्वारा विवेकाधिकार का प्रयोग मनमाना या स्पष्ट रूप से गलत न हो, तब तक उच्च न्यायालय को उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

कोई व्यक्ति उधारकर्ता या गारंटर नहीं फिर भी जा सकते हैं DRT

राजस्थान हाईकोर्ट ने SARFAESI Act से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया हैं कि यदि किसी व्यक्ति के अधिकार बैंक या वित्तीय संस्था की रिकवरी कार्रवाई से प्रभावित होते हैं, तो वह व्यक्ति भले ही ऋण का उधारकर्ता या गारंटर न हो, फिर भी उसे “पीड़ित व्यक्ति” (Aggrieved Person) माना जाएगा और वह डेब्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) का दरवाजा खटखटा सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब कानून में प्रभावी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है, तो सीधे हाईकोर्ट की रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग नहीं किया जा सकता।

ट्रस्ट चुनाव के मामले में सिविल कोर्ट सुनवाई कर सकता हैं

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सार्वजनिक ट्रस्ट के चुनाव विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रकरण में अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया है कि यदि ट्रस्ट के चुनाव में अनियमितता, भ्रष्टाचार या मिलीभगत जैसे गंभीर आरोप लगाए जाएं, तो ऐसे मामलों की सुनवाई सिविल कोर्ट कर सकती है।

केवल राजस्थान पब्लिक ट्रस्ट एक्ट का हवाला देकर सिविल अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वतः समाप्त नहीं माना जा सकता।

बिना सुनवाई का अवसर दिए अदालत द्वारा की गई कठोर टिप्पणियाँ अवैध

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी अधिकारियों के खिलाफ अदालतों द्वारा की जाने वाली कठोर या अपमानजनक टिप्पणियों पर ऐतिहासिक निर्णय दिया है।

राजस्थान हाईकोर्टने स्पष्ट किया कि बिना सुनवाई के किसी अधिकारी पर की गई टिप्पणी संविधान के अनुच्छेद 21 और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। यह फैसला न्यायिक संयम और प्रशासनिक जवाबदेही के बीच संतुलन को लेकर एक नया मापदंड स्थापित करता है।

साई रीति-रिवाजों से संपन्न सभी विवाहों को राज्य के सिविल रजिस्टर में दर्ज करना अनिवार्य

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक रिपोर्टेबल निर्णय में ईसाई समुदाय को बड़ी राहत देते हुए विवाह पंजीकरण की कानूनी प्रक्रिया को स्पष्ट किया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि ईसाई रीति-रिवाजों से संपन्न सभी विवाहों को सिविल रजिस्टर में दर्ज करना राज्य का वैधानिक दायित्व है, और कोई भी अधिकारी या संस्था इससे इनकार नहीं कर सकती। यह फैसला भारत में विवाह पंजीकरण की प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है।

आर्थिक विवाद को जातिगत अत्याचार का रंग नहीं दिया जा सकता

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट मामले में स्पष्ट किया कि केवल जातिसूचक शब्दों का आरोप पर्याप्त नहीं है, जब तक यह सिद्ध न हो कि अपमान जानबूझकर और सार्वजनिक रूप से जाति के आधार पर किया गया हो।

आपराधिक न्याय व्यवस्था में संदेह के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने आपराधिक न्याय व्यवस्था के मूल सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा कि किसी भी आरोपी को संदेह के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि न्याय ‘सहानुभूति, आक्रोश या सामाजिक दबाव’ से नहीं, बल्कि बियॉन्ड रीजनबल डाउट की कसौटी पर तय होता है। यदि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहता है, तो आरोपी को दोषमुक्त किया जाना न्याय का अनिवार्य सिद्धांत है।

पट्टा जारी करने का अधिकार स्थायी लोक अदालत को नहीं

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्थायी लोक अदालतों की अधिकार सीमा को स्पष्ट करते हुए कहा कि वे पट्टा जारी करने, स्वामित्व तय करने या संपत्ति अधिकारों से जुड़े विवादों पर निर्णय नहीं दे सकतीं।

हाईकोर्ट ने कहा कि भूमि एवं राजस्व संबंधी विवाद केवल विधिवत न्यायिक प्रक्रिया से ही तय होंगे, न कि संक्षिप्त मंचों से। यह फैसला लोक अदालतों के अधिकार-क्षेत्र की कानूनी सीमाओं को स्पष्ट करता है।

न्यायाधीश को ईमानदार, सत्यनिष्ठ और उसका नैतिक चरित्र संदेह से परे होना चाहिए

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक न्यायाधीश के प्रोफेशनल व्यवहार को लेकर स्पष्ट किया हैं कि न्यायिक सेवा कोई साधारण रोजगार नहीं, बल्कि राज्य की संप्रभु न्यायिक शक्ति से जुड़ा पवित्र दायित्व है।

हाईकोर्ट स्पष्ट किया कि न्यायाधीश कानून का पालन कराने वाला मात्र अधिकारी नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था का स्तंभ है—जिसकी सत्यनिष्ठा और चरित्र सार्वजनिक व निजी दोनों जीवन में निर्दोष होने चाहिए।

जीवन का अधिकार केवल सांस लेने का अधिकार नहीं, गरिमा के साथ जीने का अधिकार है।

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों और वृद्धाश्रमों की स्थिति पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि वृद्धाश्रमों का अस्तित्व केवल औपचारिक नहीं हो सकता — वहां बुज़ुर्गों को सम्मान, सुरक्षा, चिकित्सा और मानवीय गरिमा के साथ जीवन मिलना चाहिए।

अदालत ने टिप्पणी की कि “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव” केवल श्लोक नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता का मूल मूल्य है, जिसका पालन राज्य और समाज दोनों को करना चाहिए।

जहां विशेष कानून मौन है, वहां BNSS /CrPC लागू होगा

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत दर्ज आपराधिक मामलों में जमानत प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि उपभोक्ता आयोग किसी आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर देता है, तो वह व्यक्ति भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत सेशंस कोर्ट या हाईकोर्ट में जमानत के लिए आवेदन करने का पूर्ण अधिकार रखता है।

चिकित्सकीय कारणों से अनुपस्थिति को सेना से पलायन नहीं माना जा सकता

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सीआरपीएफ के एक जवान को चिकित्सकीय कारणों से अनुपस्थिति पर ‘डेज़र्शन’ का दोषी ठहराए जाने की कार्रवाई को अवैध करार देते हुए स्पष्ट किया कि जब तक सेवा छोड़ने की मंशा (Animus Deserendi) सिद्ध न हो, तब तक अस्थायी या चिकित्सकीय अनुपस्थिति को पलायन नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने जवान की बर्खास्तगी सहित सभी अपीलीय आदेश रद्द कर सेवा में बहाली के आदेश दिए, हालांकि अंतराल अवधि का वेतन काल्पनिक आधार पर सीमित रखा गया। यह फैसला सेवा न्यायशास्त्र में मानवता और न्याय के संतुलन का उत्कृष्ट उदाहरण है।

पति की अधिक आय का मतलब पत्नी को अधिक भरण-पोषण नहीं

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने भरण–पोषण से जुड़े एक ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया कि पति की अधिक कमाई मात्र से पत्नी को उसकी आय का बड़ा हिस्सा देने का आधार नहीं बनता, विशेषकर जब पत्नी शिक्षित हो, आत्मनिर्भर हो या स्वयं आय प्राप्त कर रही हो।

हाईकोर्ट ने कहा कि इसका उद्देश्य पति की आय का बंटवारा नहीं, बल्कि आश्रित जीवनसाथी को गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करना है।

बिना ट्रायल, बिना सजा के जेल, अनुच्छेद 21 का गंभीर उल्लंघन

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने बिना सजा और ट्रायल के छह वर्षों से जेल में बंद आरोपी को जमानत देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक कैद में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब न्यायिक प्रक्रिया दंडात्मक स्वरूप ले लेती है, तो वह न्याय व्यवस्था की आत्मा के विपरीत हो जाती है।

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