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राजस्थान हाईकोर्ट वीकली डाइजेस्ट: छठा सप्ताह – 2026 | सरल हिंदी में

Rajasthan High Court Weekly Digest 2026: Key Judgments from Week 6 (9–14 February)

जयपुर। वर्ष 2026 के छठे न्यायिक सप्ताह (9 से 14 फरवरी 2026) के दौरान राजस्थान हाईकोर्ट ने कई महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले फैसले सुनाए, जो न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम रहे बल्कि आम नागरिकों के अधिकारों, प्रशासनिक जवाबदेही और कानून की व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को भी स्पष्ट करते हैं।

इस साप्ताहिक डाइजेस्ट में हम आपके लिए लेकर आए हैं उन प्रमुख रिपोर्टेबल और ऐतिहासिक महत्व के फैसलों का संक्षिप्त और सरल हिंदी में विवरण, जिन पर पूरे सप्ताह न्यायिक और कानूनी जगत की नजर बनी रही।

यहां जानिए छठे सप्ताह के वे प्रमुख निर्णय, जिन्होंने कानूनी विमर्श को नई दिशा दी।

संयुक्त किरायेदारी में किसी एक किरायेदार के खिलाफ बेदखली का डिक्री आदेश, संयुक्त सभी किरायेदारों और उनके उत्तराधिकारियों पर भी होगा लागू

राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने किरायेदारी विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले स्पष्ट किया है कि किसी संयुक्त किरायेदार (Joint Tenant) के विरुद्ध पारित बेदखली (Eviction) डिक्री सभी संयुक्त किरायेदारों और उनके उत्तराधिकारियों पर समान रूप से लागू होगी, भले ही उन्हें मुकदमे में अलग से पक्षकार न बनाया गया हो

केवल गंभीर चोट लगना अपने-आप में हत्या के प्रयास (धारा 307 IPC) का मामला नहीं

राजस्थान हाईकोर्ट ने हत्या के प्रयास के आरोप में लगाई जाने वाली आईपीसी की धारा 307 को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए स्पष्ट किया है कि केवल गंभीर चोट लगना या पारिवारिक विवाद होना अपने-आप में हत्या के प्रयास (धारा 307 IPC) का मामला नहीं बनाता, जब तक यह साबित न हो कि आरोपी के पास हत्या करने की स्पष्ट मंशा (हॉमिसाइडल इंटेंट) थी।

परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी अधूरी होने पर दोषसिद्धि नहीं टिक सकती—हत्या के मामले में बड़ा फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण आपराधिक अपील में यह स्पष्ट किया है कि केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर तब तक दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती, जब तक घटनाक्रम की पूरी और निर्विवाद कड़ी आरोपी के अपराध से सीधे-सीधे जुड़ी सिद्ध न हो जाए।

उचित कारण और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन जरूरी

राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ में जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी शिक्षक या विभागाध्यक्ष को बिना उचित कारण और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए हटाया नहीं जा सकता।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सरकारी वित्तपोषित विश्वविद्यालयों में कोई भी पद व्यक्तिगत इच्छा या मनमर्जी के आधार पर नहीं चल सकता।

डीएनए टेस्ट के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता लेकिन सत्य तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिक जांच जरूरी

राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने पारिवारिक संपंति विवाद में मां द्वारा बेटी को बेटी मानने से इनकार करने से पैदा हुए कानूनी बिंदू को “rarest of rare” मानते हुए ऐतिहासिक और रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए मां का डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दिया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी महिला द्वारा स्वयं किसी व्यक्ति को अपनी संतान मानने से इनकार किया जाता है, तो सत्य की पुष्टि के लिए डीएनए परीक्षण कराया जाना न्यायहित में आवश्यक हो सकता है।

केवल सजा से असंतोष के आधार पर निजी शिकायतकर्ता को सामान्य अपील का अधिकार नहीं

राजस्थान हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों में अपील के अधिकार और सजा से जुड़े सिद्धांतों को स्पष्ट करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा हैं कि यदि किसी आरोपी को दोषसिद्धि के बाद प्रोबेशन (परिवीक्षा) का लाभ दिया गया है, तो केवल सजा से असंतोष के आधार पर निजी शिकायतकर्ता को अपील करने का अधिकार नहीं है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अपील का अधिकार पूरी तरह वैधानिक है और इसे कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर ही प्रयोग किया जा सकता है।

A- वादी ही मुकदमे का “डोमिनस लिटिस”, लेकिन वादी भी किसी को भी मनमर्जी से मुकदमे में पक्षकार नहीं बना सकता

राजस्थान हाईकोर्ट ने भूमि विवाद से जुड़े एक ओर महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि भले ही वादी को मुकदमे का “डोमिनस लिटिस” यानी मालिक माना जाता है, लेकिन उसे भी यह पूर्ण अधिकार नहीं है कि वह किसी भी व्यक्ति को अपनी इच्छा से मुकदमे में पक्षकार बना दे।

हाईकोर्ट ने कहा कि कहा कि केवल वही व्यक्ति मुकदमे में शामिल किया जा सकता है जो विवाद के समाधान के लिए आवश्यक या उचित पक्षकार हो।

B- वादी ही मुकदमे का “डोमिनस लिटिस”, उसका अधिकार है कि वह तय करे कि किन व्यक्तियों को पक्षकार बनाया जाए

राजस्थान हाईकोर्ट ने भूमि विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी भी सिविल मुकदमे में वादी (Plaintiff) को यह अधिकार होता है कि वह तय करे कि किन व्यक्तियों को पक्षकार बनाया जाए।

हाईकोर्ट ने कहा कि जिस व्यक्ति के खिलाफ कोई राहत नहीं मांगी गई है, उसे जबरन मुकदमे में पक्षकार नहीं बनाया जा सकता। इसी सिद्धांत के आधार पर कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की याचिका खारिज कर दी।

ठोस कारण और वास्तविक आशंका के बिना लंबे समय तक निलंबन रखना कानून के खिलाफ

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने सरकारी कर्मचारियों के निलंबन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कथित घटना के कई वर्षों बाद और कर्मचारी के ट्रांसफर के बाद निलंबन किया जाता है, तो ऐसे निलंबन का औचित्य साबित करना प्रशासन के लिए आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने कहा कि बिना ठोस कारण और बिना किसी वास्तविक आशंका के कर्मचारियों को लंबे समय तक निलंबित रखना कानून की दृष्टि में उचित नहीं माना जा सकता।

पदोन्नति पाना मौलिक अधिकार नहीं, केवल पदोन्नति के लिए “विचार किए जाने” का ही अधिकार

राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने पदोन्नति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी को केवल पदोन्नति के लिए “विचार किए जाने” का अधिकार होता है, पदोन्नति पाने का स्वतः कोई मौलिक अधिकार नहीं होता।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि उच्च पदों पर रिक्तियां कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने के बाद उत्पन्न होती हैं, तो सेवानिवृत्त कर्मचारी उन पदों पर पदोन्नति का दावा नहीं कर सकता।

अधिवक्ताओं को आर्थिक और बुनियादी संसाधनों की सहायता देना आवश्यक

राजस्थान हाईकोर्ट युवा और प्रथम-पीढ़ी के अधिवक्ताओं के हित में आदेश जारी करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, जयपुर को “जूनियर एडवोकेट्स वेलफेयर फंड फॉर परचेजिंग लॉ बुक्स” के नाम से अलग बैंक खाता खोलने और उसकी अनुपालना रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने के आदेश दिए हैं.

न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढांड ने अपने विस्तृत आदेश में स्पष्ट कहा कि न्याय प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए युवा अधिवक्ताओं को आर्थिक और बुनियादी संसाधनों की सहायता देना आवश्यक है।

विधवा का पुनर्विवाह होने मात्र से मुआवजा पाने का अधिकार समाप्त नहीं होता

राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए स्पष्ट किया है कि पति की मृत्यु के बाद विधवा का पुनर्विवाह होने मात्र से उसका मुआवजा पाने का अधिकार समाप्त नहीं होता।

हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि, परिस्थितियों के अनुसार आश्रितों के हितों को ध्यान में रखते हुए मुआवजे के वितरण में संतुलन बनाया जा सकता है।

माता-पिता मृत कर्मचारी की आय पर आंशिक या पूर्ण रूप से निर्भर थे तो वे भी मुआवजा पाने के पात्र हो सकते हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून की परिभाषा के अनुसार यदि माता-पिता मृत कर्मचारी की आय पर निर्भर थे तो उन्हें भी डिपेंडेंट माना जाएगा और मुआवजे का दावा करने का अधिकार होगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि मृतका विवाहित थी या नहीं, यह केवल बयान के आधार पर तय नहीं किया जा सकता; इसके लिए उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण आवश्यक है।

पेशेवर पाठ्यक्रमों में शैक्षणिक कैलेंडर की पवित्रता बनाए रखना सर्वोपरि, समझौता नहीं किया जा सकता

राजस्थान हाईकोर्ट ने बीएससी नर्सिंग शैक्षणिक सत्र 2025–26 की केंद्रीय काउंसलिंग प्रक्रिया में शामिल किए जाने की मांग करने वाले चार नवनिर्मित नर्सिंग कॉलेजों को बड़ी राहत देने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि शैक्षणिक सत्र के बीच काउंसलिंग प्रक्रिया को दोबारा खोलना, सीट मैट्रिक्स में बदलाव करना याबाद में मान्यता प्राप्त संस्थानों को शामिल करना सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित शैक्षणिक अनुशासन और निर्धारित समयसीमा के विरुद्ध होगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि पेशेवर पाठ्यक्रमों में शैक्षणिक कैलेंडर की पवित्रता बनाए रखना सर्वोपरि है और इसे किसी भी परिस्थिति में बाधित नहीं किया जा सकता।

सड़क सुरक्षा अनुच्छेद-21 के तहत नागरिकों के जीवन जीने का अधिकार

राजस्थान हाईकोर्ट ने सड़क सुरक्षा और आमजन के जीवन की सुरक्षा को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए संपूर्ण राजस्थान के नेशनल और स्टेट हाईवे पर मौजूद करीब 2000 अतिक्रमण अगले दो माह में हटाने के आदेश दिये हैं.

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया हैं कि अतिक्रमण चाहे धार्मिक स्थल हो या आवासिय मकान हो या व्यवसायिक प्रतिष्ठान हो, किसी को भी छूट नहीं दी जायेगी.

BNSS के तहत मजिस्ट्रेट को संज्ञान से पहले आरोपियों से सीमित सुनवाई का अधिकार

राजस्थान हाईकोर्ट ने चित्तौड़गढ़ शिक्षक और शिक्षिका वायरल वीडियो मामले में मजिस्ट्रेट के ‘प्री-कॉग्निज़ेंस सुनवाई’ के अधिकार पर बड़ा फैसला देते हुए स्पष्ट किया कि नए आपराधिक प्रक्रिया भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत मजिस्ट्रेट को शिकायत मामलों में संज्ञान लेने से पहले आरोपित व्यक्तियों को सीमित रूप से सुनवाई का अवसर देने का अधिकार है और इस उद्देश्य से जारी समन को स्वतः अवैध नहीं माना जा सकता।

धारा 12-A के तहत प्री-इंस्टीट्यूशन मीडिएशन अनिवार्य नहीं

राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने व्यावसायिक विवादों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी वाद में तत्काल अंतरिम राहत (Urgent Interim Relief) की मांग की गई हो तो वाद दाखिल करने से पहले अनिवार्य प्री-इंस्टीट्यूशन मेडिएशन की शर्त लागू नहीं होगी।

भर्ती प्रक्रिया में योग्यता प्राप्त करने की वास्तविक तिथि महत्वपूर्ण

राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी अभ्यर्थी ने वास्तविक रूप से निर्धारित कट-ऑफ तिथि से पहले आवश्यक शैक्षणिक योग्यता प्राप्त कर ली है, तो विश्वविद्यालय द्वारा समेकित परिणाम या अंकतालिका देर से जारी होने के आधार पर उसे चयन से वंचित नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया में वास्तविक योग्यता प्राप्त करने की तिथि को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और तकनीकी देरी के आधार पर अधिक मेरिट वाले उम्मीदवार को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता।

कानून में प्रावधान नहीं होने पर अपील नहीं कि जा सकती

राजस्थान हाईकोर्ट ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के एक अनुशासनात्मक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया हैं ​कि अपील का अधिकार स्वाभाविक या मौलिक नहीं होता, बल्कि यह पूर्णतः कानून द्वारा प्रदत्त अधिकार है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी अधिनियम या नियम में अपील का प्रावधान नहीं है, तो संबंधित प्राधिकारी अपील सुनने का अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता।

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